पीहर चली गई घरवाली.. अब अपनी हर रोज दीवाली…….

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पीहर चली गई घरवाली.. अब अपनी हर रोज दीवाली…….

-सुरूचि परिवार ने गुरूग्राम में किया काव्य गोष्ठी का आयोजन, 25 कवियों ने भाग लिया

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/द्वारका/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/भावना शर्मा/- सुरुचि परिवार के तत्वावधान में रविवार को गुरुग्राम के वरिष्ठ रचनाकार त्रिलोक कौशिक के सानिध्य में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार लक्ष्मी शंकर बाजपेई ने की। हालांकि सभी कवियों ने अपनी कविताओं से सभी को भावविभोर कर दिया फिर भी हरिन्द्र यादव की कविता पीहर चली गई घरवाली, अब अपनी हर रोज दीवाली को काफी सराहा गया।
इस काव्य गोष्ठी में जाने माने कवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जिसमें ममता किरण ,डा गुरविंदर बांगा, मंसूर फरीदाबादी, अजय अक्स, कृष्ण गोपाल विद्यार्थी, नरेंद्र खामोश, हरींद्र यादव, मोनिका शर्मा, विमलेंदु सागर, ए डी अरोड़ा, सुरिन्दर मनचंदा सहित लगभग 25 कवियों ने काव्य पाठ किया। इस अवसर पर त्रिलोक कौशिक ने अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन के विविध रूपों का भावपूर्ण चित्रण करते हुए कहा कि……..

मरघट का सामान नहीं हैं कविताएं,
कविताएं जीवन की अनुपम थाती हैं।

कृष्ण गोपाल विद्यार्थी ने अपनी गजल के माध्यम से व्यंग्य किया –
था किसे मालूम कि ये हादसा हो जायेगा ।
सिर्फ कहने भर से एक पत्थर खुदा हो जायेगा ।

हरीन्द्र यादव ने कहा,
पीहर चली गयी घरवाली ,
अब अपनी रोज दीवाली ।
हम ही घर के मालिक भैया ,
हम ही घर के माली ।

नरेन्द्र खामोश ने पुराने दिनों को याद करते हुये अपनी रचना पढ़ी,
वो दिन कहाँ रहे ,वो जमाने कहाँ रहे ।
वो महफिलों के दौर पुराने कहाँ रहे ।

डा. गुरबिंदर बांगा ने देश में धर्म के नाम पर किए जा रहे बंटवारे पर चोट करती गजल पढ़ी –
हाकिम ने दस्तखत किये, सौदा भी पट गया ।
अच्छा भला दरख्त कुल्हाड़ी से कट गया ।

विमलेन्दु सागर ने कटाक्ष करते हुऐ कहा,
फासला इतना नहीं था कि मिल न पाते हम ।
मसला ये था कि बुलाते वो या बुलाते हम ।

कमल की पंक्तियां इस प्रकार थी
चीखती बाँसुरी श्वास की चोट से ।
घाव हैं देह पर अंगुलियां मत धरो ।

वीरेंद्र कौशिक की मार्मिक रचना को खूब सराहना मिली –
गर्भ में बेटी मारो मतना,
छोड़ो पाप कमाना ।
धर्मराज के लगे कचहरी ,
पड़ेगा हिसाब चुकाना ।

अजय अक्स ने अपने शायरी से समां बांध दिया –
हथेली पर मैं छाला चाहता हूँ ,
तेरे बगैर बुझते चरागों के आस- पास ।

अब्दुल रहमान मंसूर ने कहकहों के पीछे छुपे आँसू का दर्द अपनी शायरी में बयां किया –
हँसने वालों से इल्तजा है मेरी ,
सोच थोड़ी सी मोड़कर देखो ।
खून टपकता दिखाई देगा तुम्हें,
कहकहों को निचोड़ कर देखो ।

मनोज टिकरी ने अपनी रचना में बेटियों को पिरोया –
बेटियां लाडली होती हैं पिता की ,
सखी होती हैं माता की ।
ममता किरण ने भी बेटियों पर बहुत प्रभावी कविता पढ़ी। काव्योत्सव की अध्यक्षता कर रहे लक्ष्मी शंकर बाजपेई ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कार्यक्रम की समीक्षा करने के अलावा देश के लिए प्राण न्यौछावर करनेवाले शहीदों को भी याद किया। इस काव्य गोष्ठी में कवियों ने कुछ यूं समा बांधा की श्रोता कुर्सियों से ही चिपक कर रह गये।

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