गुजिया का शाही सफर: तुर्की से भारत तक की सांस्कृतिक विरासत

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गुजिया का शाही सफर: तुर्की से भारत तक की सांस्कृतिक विरासत

-क्या कहते हैं इतिहासकार -तुर्की से गुजिया का कनेक्शन

नई दिल्ली/सिमरन मोरया/-  होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि स्वाद और मिठास का भी त्योहार है। लोग दिनभर पानी की होली खेलते हैं, गुलाल उड़ाते हैं और मस्ती करते हैं, वहीं शाम को परिवार और दोस्तों के साथ बैठकर मिठाइयों का आनंद लिया जाता है। इन मिठाइयों में गुजिया का विशेष स्थान है। गुजिया का स्वाद हर किसी को भाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसकी उत्पत्ति कहां हुई और यह होली से इतनी गहरी जुड़ी क्यों है?

क्या हैं गुजिया का इतिहास?
कुछ लोगों का मानना है कि गुजिया की जड़ें प्राचीन भारत में हैं। संस्कृत ग्रंथों में ‘करणिका’ नामक एक मिठाई का उल्लेख मिलता है, जो सूखे मेवों से भरी और शहद से मीठी होती थी। यह आधुनिक गुजिया की पूर्वज हो सकती है। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि गुजिया शायद लोकप्रिय भारतीय स्नैक समोसा का मीठा संस्करण हो, जिसे मध्य-पूर्व से व्यापारिक मार्गों के जरिए भारत लाया गया।

क्या कहते हैं इतिहासकार?
इतिहासकार संजय त्रिपाठी के अनुसार, गुजिया पुराने समय की मिठाई ‘अंसे’ या ‘एरसे’ का विशेष संस्करण हो सकती है। यह गेहूं के आटे और गुड़ से बनी तली हुई मिठाई थी, जिसे जैन समुदाय बनाता था। 1500 के दशक तक आते-आते, गुजिया ब्रज क्षेत्र, विशेषकर मथुरा और वृंदावन, में लोकप्रिय हो गई। यहां इसे इलायची और अन्य मसालों के साथ स्वादिष्ट बनाया जाता और भगवान कृष्ण को प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाता। वृंदावन के राधा रमन मंदिर में आज भी 500 साल से गुजिया और चंद्रकला मंदिर भोज का हिस्सा हैं।

तुर्की से गुजिया का कनेक्शन
कुछ विद्वान गुजिया और तुर्की की बाक्लावा में समानता देखकर मानते हैं कि गुजिया की रेसिपी परबाक्लावा का प्रभाव हो सकता है। व्यापारिक मार्गों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिए यह विचार भारत आया और धीरे-धीरे बदलकर आज की गुजिया बन गई। समय के साथ, गुजिया होली के त्योहार से जुड़ गई। होली के रंगों की तरह गुजिया के भीतर भी खवा, मेवे और मीठे फल भरे जाते हैं। आधुनिक गुजिया में नारियल, चॉकलेट जैसे नए फ्लेवर भी शामिल किए जाते हैं, जो बच्चों और युवाओं में खास लोकप्रिय हैं।

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को करें फील
तो अगली बार जब आप होली पर गुजिया का स्वाद लें, तो इसके पीछे छुपी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता को भी महसूस करें। यह मिठाई केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि हमारी परंपरा और संस्कृति का प्रतीक भी है। गुजिया का त्योहार और इसका महत्व, होली को और भी रंगीन और स्वादिष्ट बनाता है।

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