थोड़ी झपकी सी क्या आई
आंख खुली तो सामने धुंधलके से थे
दिख रही थी कहीं दूर तलक
शायद उजाले की एक लकीर
वो सचमुच थी या सिर्फ छलावा
पता ही नहीं चला
मेरी तरफ़ आ रही थी
या मुझे चिढ़ा कर
कहीं जाने की कवायद में थी
पता ही नहीं चला
पता होता तो क्या मैं रोक लेता
या रोकने की कोशिश करता
हां ना करते करते कितने साल
निकल गये यूं ही
पता ही नहीं चला
चमकती दोपहर कब निकल गई
कब अंधेरी शाम हो गई
पता ही नहीं चला
अमिताभ श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार, कवि और ब्लॉगर


More Stories
”यूरोप की अंतरराष्ट्रीय वुशू चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली गोल्डन गर्ल केशवी डागर का झाड़ौदा गांव में भव्य सम्मान”
रेवंत रेड्डी की अमेरिका यात्रा रद्द, केंद्र से नहीं मिली मंजूरी!
मुंबई में एयरहोस्टेस से दुष्कर्म का आरोप, किन्नर बनकर घर में घुसा आरोपी
”दिल्ली के द्वारका स्तिथ यशोभूमि में शुरू हुआ मटेशिया 2026”
तिरंगे के साथ दौड़े 80 धावक, साइकिलिस्टों ने पूरी की 80 किमी राइड
मधु विहार में हर्षोल्लास से मनाया गया स्वतंत्रता दिवस