थोड़ी झपकी सी क्या आई
आंख खुली तो सामने धुंधलके से थे
दिख रही थी कहीं दूर तलक
शायद उजाले की एक लकीर
वो सचमुच थी या सिर्फ छलावा
पता ही नहीं चला
मेरी तरफ़ आ रही थी
या मुझे चिढ़ा कर
कहीं जाने की कवायद में थी
पता ही नहीं चला
पता होता तो क्या मैं रोक लेता
या रोकने की कोशिश करता
हां ना करते करते कितने साल
निकल गये यूं ही
पता ही नहीं चला
चमकती दोपहर कब निकल गई
कब अंधेरी शाम हो गई
पता ही नहीं चला
अमिताभ श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार, कवि और ब्लॉगर


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