कब शाम हो गई पता ही नहीं चला

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May 18, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

कब शाम हो गई पता ही नहीं चला

थोड़ी झपकी सी क्या आई
आंख खुली तो सामने धुंधलके से थे
दिख रही थी कहीं दूर तलक
शायद उजाले की एक लकीर
वो सचमुच थी या सिर्फ छलावा
पता ही नहीं चला

मेरी तरफ़ आ रही थी
या मुझे चिढ़ा कर
कहीं जाने की कवायद में थी
पता ही नहीं चला

पता होता तो क्या मैं रोक लेता
या रोकने की कोशिश करता
हां ना करते करते कितने साल
निकल गये यूं ही
पता ही नहीं चला

चमकती दोपहर कब निकल गई
कब अंधेरी शाम हो गई
पता ही नहीं चला

अमिताभ श्रीवास्तव

वरिष्ठ पत्रकार, कवि और ब्लॉगर

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