दोराहे पर कांग्रेस! पुरानी प्रतिष्ठा के लिए क्या विचारधारा बदलेगी कांग्रेस..?

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February 12, 2026

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दोराहे पर कांग्रेस! पुरानी प्रतिष्ठा के लिए क्या विचारधारा बदलेगी कांग्रेस..?

-कांग्रेस अधिवेशन में राहुल गांधी व शशि थरूर ने रखी दो अलग-अलग विचार धाराऐं

अहमदाबाद/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- देश की सबसे पुरानी पार्टी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अहमदाबाद में चले दो दिन के कांग्रेस अधिवेशन में यह बात पूरी तरह से साफ भी गई है। पार्टी आज पुरानी प्रतिष्ठा पाने के लिए मंथन कर रही है लेकिन पार्टी भविष्य में क्या मार्ग अपनाए, इसको लेकर अभी असमंजस बना हुआ है। क्योंकि वह आज जिस जगह पर खड़ी है वहां दो तरह के विचार मौजूद हैं। एक विचार टकराव वाला और नकारात्मक है। जबकि, दूसरे में सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने की ललक दिख रही है।

पार्टी के पास एक विकल्प है बीजेपी के साथ टकराव वाली राजनीति के पथ पर चलते रहने की, जो अभी मल्लिकार्जुन खड़गे की अगुवाई और राहुल गांधी के मार्गदर्शन में हो रहा है। दूसरा विकल्प वह है, जो केरल से पार्टी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने दिया है।अब देखना यह है कि पार्टी किस दिशा में चलने का ऐलान करती है?दोराहे पर खड़ी कांग्रेस!थरूर ने कहा है, ’एक पार्टी के तौर पर हमें भविष्य की ओर देखना है, सिर्फ अतीत की ओर नहीं। एक ऐसी पार्टी जिसका दृष्टिकोण सकारात्मक हो, न कि मात्र नकरात्मकता भरी हो। एक ऐसी पार्टी जो समाधान बता सके, न कि सिर्फ नारेबाजी करती रह जाए।’थरूर ने कांग्रेस को दिया विकल्पथरूर ने जो कुछ कहा है, वह इस वजह से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उन्होंने उस गुजरात की धरती पर पार्टी को जगाने की कोशिश की है, जो गांधी और सरदार पटेल दोनों की भूमि है। दिलचस्प बात ये है कि जब पटेल को बीजेपी ने सियासी तौर पर भुनाने में कोई कमी नहीं रख छोड़ी है तो कांग्रेस को भी अब उस ओर देखने की आवश्यकता महसूस होने लगी है।

थरूर के मुताबिक, ’हमें आज नकारत्मकता की जगह सकारत्मक सोच की जरूरत है। हमें पहले जो वोट मिले हैं, उसे बनाए रखने की आवश्यकता है, लेकिन हमें यह भी याद रखना है कि हम पिछले तीन चुनाव जीतने में नाकाम रहे हैं और पहला संकल्प हमें उसी की ओर ले जाता है। इसलिए अब समय आ गया है जब हम अपनी विचारधारा में सकारात्मकता को जोड़ें। नकारत्मकता हमे सिर्फ सीमित अवसरों तक ही ले जा सकती है।अभी भाजपा पर हमलावर बने है खड़गे और राहुलदो दिनों के कांग्रेस अधिवेशन में थरूर के ये विचार कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की लाइन से ठीक उलट है। कांग्रेस के इन दोनों शीर्ष नेताओं ने उस गुजरात में बीजेपी और आरएसएस पर अपना हमला जारी रखा है, लेकिन पिछले तीन चुनावों में लगातार भाजपा की विचारधारा का दबदबा कायम है और हाल के निकाय चुनावों में कांग्रेस का मुस्लिम जनाधार भी उससे छिटकर भाजपा का मुंह देखने लगा है। मुस्लिमों के अलावा ईसाई, सिख और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए भी चिंताराहुल और खड़गे के नेतृत्व में कांग्रेस भाजपा और संघ पर हमला जारी रखने के लिए नए वक्फ कानून को अपना हथियार बनाना चाह रही है और इसे कथित रूप से धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान के खिलाफ बताने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस का आरोप है कि कथित तौर पर मुसलमानों को निशाना बनाने के बाद आरएसएस और बीजेपी ईसाई, सिख और अन्य अल्पसंख्यकों को भी टारगेट करेंगे। राष्ट्रवाद बनाम छद्म राष्ट्रवादइनके अलावा कांग्रेस ने भाजपा पर चुनावों में कथित धांधली और संविधान के लिए खतरा बताने के साथ-साथ उसके कथित ’विभाजनकारी विचारधारा’ के नाम पर भी निशाना साधने की कोशिश की है। कांग्रेस का दावा है कि उसका राष्ट्रवाद लोगों को एकजुट करता है, जबकि बीजेपी का कथित ’छद्म राष्ट्रवाद’ नफरत और पूर्वाग्रह से भरा पड़ा है।आखिर किस राह को चुनेगी कांग्रेस?अब कांग्रेस पार्टी को तय करना है कि वह भविष्य में किस रास्ते पर चलने का संकल्प लेती है। कांग्रेस की पुरानी सोच ने उसे लगातार तीन चुनाव हरवायें हैं। जबकि भाजपा पर ’छद्म राष्ट्रवाद’ फैलाने का आरोप लगाने वाली कांग्रेस के हाथ से अब उसका मुस्लिम वोट बैंक भी फिसलता नजर आ रहा है और यह बात निकाय चुनावों में सामने भी आ चुकी है। अब यह बात और भी सोचने लायक है कि जिस एजेंडे पर कांग्रेस चल रही है उस पर उसकी सफलता के कोई पुख्ता परिणाम सामने नही आ रहे हैं जिसकारण अब यह जरूरी हो जाता है कि अगर कांग्रेस को सत्ता चाहिए तो उसे एकबार फिर अपनी विचारधारा को लेकर सोचना होगा। अब अगर शशि थरूर की बात करे तो थरूर हाल के दिनों में अपने कई बयानों से सुर्खियों में रहे हैं, जिसे बीजेपी की अगुवाई वाली मोदी सरकार की सराहना के तौर पर देखा गया है। यह चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की कूटनीति हो या फिर कोविड माहमारी के दौरान वैक्सीन वाली कूटनीति। इसी बात को लेकर कांग्रेस असमंजस में है।

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