“महाराजा अग्रसेन जयंती: अग्रवाल समाज के प्रवर्तक का सम्मान”

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September 7, 2026

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“महाराजा अग्रसेन जयंती: अग्रवाल समाज के प्रवर्तक का सम्मान”

पतंगों की तरह इस विश्व रंगमंच पर प्राणी आते हैं और चले जाते हैं। जातियां उत्पन्न होती है अपना विकास कर चरमोन्नति के पश्चात काल के गाल में समाकर समाप्त हो जाती है, यदि कुछ रह जाता है तो वह है उनके द्वारा किए गये कार्यों की कर्म गाथा। महाराजा अग्रसेन की भी गाथा और उनका यशोगान अमर है। हजारों वर्ष पूर्व इस धरती पर अवतरित हुये राजाधिराज अब भी अपनी प्रजावत्सलता न्याय, दानशीलता, धार्मिकता एवं लोकोपकारी प्रवृत्तियों और श्रेष्ठ आदर्शों के कारण याद किये जाते हैं। महाराज अग्रसेन द्वारा अर्जित राज्य की सीमायें पश्चिम में मारवाड़, दक्षिण में अग्रोहां, पूर्व में आगरा तथा उत्तर में हिमालय की तराइयों तक विशाल भूभाग में फैला एक बड़ा देश था। महाराज अग्रसेन, अपने राज्य की सुदृढ़ व्यवस्था के लिये राज्य को हिसार, नारनोद, रोहतक, हांसीलोग सिरसा, दिल्ली, मेरठ जगाधारी, अमृतसर, उदयपुर, अलवर आदि अट्ठारह भागों में विभक्त कर दिया था। वे सभी छोटे छोटे प्रांत महासंघ के ही हिस्सा थे एवं पूरे देश की बागडोर अंतिम रूप से अग्रसेन के हाथों में सुरक्षित थी। इन अठारह राज्यों के स्थानीय शासन -प्रशासन संचालन के लिये प्रतिनिधियों की नियुक्ति की गई थी। इन प्रतिनिधियों को महाराज अग्रसेन पुत्रवत स्नेह देते थे।

महाराज अग्रसेन का एक सिद्धांत काफी सर्वप्रिय था। वह था सर्वधर्म समभाव की तरह सर्वजन समभाव। वे किसी भी प्रजा को अपने राज्य में निर्धन नहीं देखना चाहते थे। सभी को सुखी एवं संपन्न देखना उनका सपना एवं कार्य था। तभी तो प्रजा ने भी उनके सिद्धांतों को समग्र रूप से अपना कर उसे व्यावहारिकता का जामा पहना दिया था।  नियमानुसार राज्य में आने वाले सभी निर्धनों को वहां के लोग एक एक स्वर्ण मुद्रा देकर अपने समान बना लेते थे ताकि राज्य में आने वाला निर्धनता का अनुभव न करे। ऐसी अप्रतिम व्यवस्था और ऐसी उदार मनोभावना का प्रचार प्रसार सर्व साधारण में आज के इस प्रगतिशील, उन्नत तथा विश्व बंधुत्व की भावना से ओत प्रोत इस युग में भी नहीं देखा जा सका है। अन्य उदाहरण भी इतिहास के पन्नों को पलटने पर नहीं मिलता कि किसी राज्य में नव आगंतुकों को एक ईंट एक स्वर्ण मुद्रा देकर अपने समान बना लेने की महाराजा अग्रसेन के जैसे शासन प्रणाली लागू की गई होगी।

महाराज अग्रसेन एक राजा के पहले एक मानव थे और व्यक्तिगत रूप से भी इन गुणों, आदर्शों व महान कार्यों की दृष्टि से काल की सीमाओं में नहीं बांधे जा सकते। महाराज अग्रसेन द्वारा ही बनिया समाज की स्थापना की गई है। ऐसा माना जाता है कि पौराणिक महायुद्ध “महाभारत”  के कुछ समय बाद व आज से लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व अग्रसेन द्वारा अग्रवाल (बनिया) समाज की स्थापना की गई थी। यह अग्रसेन की कुशल नीति का व उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम है कि उनके द्वारा स्थापित समाज आज भी समय की गति को पहचानते हुए युगानुकूल ताल के साथ ताल मिलाकर युग को नवीन गति देने में संलग्न है। अनेक सभ्यताएं नष्ट हो गई। रोम और युनान की सभ्यता अब केवल इतिहास की पुस्तकों में ही सिमटकर रह गई है किन्तु अग्रजाति का अस्तित्व आज भी फल फूल रहा है, गौरवान्वित हो रहा है।

महाराजा अग्रसेन ने राज्य तंत्रवादी परम्परा को त्यागकर. समाजवाद के समन्वयवादी सिद्धांतों को बड़ी आत्मीयता से आत्मसात किया। अपनी प्रजा को मन से, हृदय से बड़े सहजरुप में इसे अपना लेने के लिये साथ ले लिया था। ‘प्रजा ने भी उनके सिद्धांतों को व्यवहारिकता का रूप देने ने कभी आनाकानी नहीं की अर्थात – “जैसा राजा “वैसी प्रजा” वाली कहावत को चरितार्थ करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। आज इस स्वार्थ भरे माहौल में जीने वाले लोगों को अपने इस गौरवपूर्ण अतीत से शिक्षा लेनी होगी। समाज के देश के धनी लोग अगर निर्धनों पर कृपा दृष्टि करें। उनकी सहायता करें तो असंभव नहीं है कि हमारा समाज हमारा देश फिर उसी गौरवशाली समतापूर्ण स्वरूप को पा जाये। आज अग्रसेन जयंती के पावन पर्व पर सभी को संकल्प लेना चाहिये कि हम सामाजिक, आर्थिक, – राजनीतिक, धार्मिक, चिकित्सकीय, परोपकार, सहयोग एवं समानता सहित सभी जग हितार्थ कार्यों में मानव समाज के कल्याण एवं प्रगति के कार्य करने के लिये आगे आयें। हमें महाराजा अग्रसेन जी के बताये बनाये सत्य, अहिंसा, न्याय, त्याग, समाजवाद और सहकारिता के रास्ते पर चलना चाहिये जिससे बुराईयां स्वयंमेव समाप्त हो जायेगी। हमे मात्र अपने गौरवपूर्ण इतिहास का हवाला देकर ही शांत नहीं रह जाना चाहिये बल्कि हमें इतिहास के अनुरूप ही – सेवाभाव, समभाव में कार्य करना होगा।” तभी हमारा वर्तमान और भविष्य भी अतीत के समान गौरशाली व सुनहरा हो सकेगा। आईये सभी मिलकर महाराजा अग्रसेन जी की   जयंती के अवसर पर उन्हें स्मरणांजलि स्वरुप कुछ श्रद्धा के फूल अर्पित करें।

मिले तुम्हें नई मुस्कान, फिर जग में सबेरा हो।। 

घृणा का पाप धोकर स्नेह धारा में नहाओ तुम ।। 

पुरानी लीक पर चलना तुम्हे शोभा नहीं देता।

 नया विश्वास लेकर पथ नया अपना बनाओ तुम ।।

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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