रमज़ान, फुलेरा दूज, दांडी कूच, सावित्री बाई फुले व नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर होगा पॉजिटिव मीडिया डायलॉग

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February 13, 2026

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रमज़ान, फुलेरा दूज, दांडी कूच, सावित्री बाई फुले व नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर होगा पॉजिटिव मीडिया डायलॉग

-आरजेएस पीबीएच-सिल्वर ओक पब्लिक स्कूल के शैक्षणिक कार्यक्रम में साधु प्रेम सागर जगदीश दास जी देंगे व्याख्यान

नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- शिक्षकों, विद्यार्थियों और अभिभावकों के साथ “आधुनिक समय में शिक्षा की बदलती प्रणाली“ पर राम-जानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस (आरजेएस पीबीएच) दिल्ली स्थित सिल्वर ओक पब्लिक स्कूल, स्वरूप नगर, जीटी करनाल रोड के सहयोग से एक सेमिनार का आयोजन गुरुवार 14 मार्च को करने जा रहा है। आरजेएस पीबीएच संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता स्कूल के चेयरमैन चौधरी इंद्राज सिंह सैनी करेंगे और
श्री कबीर आश्रम, जामनगर के साधु प्रेम सागर जगदीश दास जी मुख्य अतिथि होंगे।
अतिथियों का स्वागत स्कूल के एमडी राकेश सैनी और धन्यवाद ज्ञापन निर्मला देवी करेंगी।
         श्री मन्ना ने बताया कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सभी नियमों की शुरुआत सत्र 2024-25 से की जाएगी। सिल्वर ओक पब्लिक स्कूल में रमज़ान, फुलेरा दूज, दांडी मार्च और सावित्री बाई फुले पर पॉजिटिव मीडिया डायलॉग भी किया जाएगा। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि 12 मार्च को फुलेरा दूज का त्योहार श्री राधा कृष्ण को समर्पित है और  ये होली के आगमन का प्रतीक भी है।
         इस्लाम धर्म में सबसे पाक  माह-ए-रमजान इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार नौवां महीना होता है और लोग 12 मार्च से 9 अप्रैल तक लगभग महीने भर रोजा रखा जा रहा है। सूरज निकलने से लेकर डूबने तक कुछ भी नहीं खाते पीते हैं। ये माह इबादत, आत्मसुधार और परोपकारी बनने का संकल्प दिलाता है।
         साबरमती आश्रम से महात्मा गांधी ने चौबीस दिवसीय 12 मार्च 1930 से 6 अप्रैल 1930 तक नमक सत्याग्रह के लिएदांडी कूच किया था।
         भारत की प्रथम महिला शिक्षिका साबित्रीबाई फुले की 10 मार्च पुण्यतिथि  पर विनम्र श्रद्धांजलि। इन्होंने अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले की प्रेरणा से भारत में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल सहित कुल 18 स्कूल खोले। उन्होंने छुआछूत, सती प्रथा, बाल-विवाह, और विधवा विवाह जैसी कुरीतियों के  विरूद्ध काम किया। सन् 1897 में पुणे में महामारी आने पर लोगों की सेवा करते-करते 10 मार्च को अंतिम सांस ले ली।

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