स्वतंत्रता के प्रथम सूत्रधार महर्षि दयानन्द – डॉ. रमेश कुमार

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

August 2026
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31  
August 17, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

स्वतंत्रता के प्रथम सूत्रधार महर्षि दयानन्द – डॉ. रमेश कुमार

-12 फरवरी को महर्षि दयानंद सरस्वती की 200 वी जयंती पर विशेष

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/भावना शर्मा/- स्वतंत्रता आन्दोलन के यज्ञ कुंड मे लाखों लोगों ने अपने जीवन की आहुति देकर पवित्र किया था जब जाकर हमे आजादी प्राप्त हुई थी। सन् 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन को हम सैनिक विद्रोह और मंगल पांडे के नाम से जानते है लेकिन इसके पीछे की पृष्टभूमि को नहीं जानते है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के गरम और नरम दल के नेताओं के पीछे जो शक्ति काम कर रही थी वों महर्षि दयानंद सरस्वती ही थे। राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए उनके महान्‌ योगदान पर अभी हमारी दृष्टि नहीं जाती है। संसार उनको एक समाज सुधारक व धार्मिक महापुरुष के रूप में ही जानती है। लेकिन इन्होंने अपने जीवन के अमूल्य तीन वर्ष संवत 1855 से 1857 राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए गुप्त रूप से लगाए थे लेकिन वे कभी सामने नहीं आए।

                 महर्षि दयानंद क्रान्ति की पृष्ठभूमि की तैयारी सन्तों के साथ करने लगे तथा अन्य विशेष लोगों को भी योजना में संलग्न करने लगे और इस प्रकार की सभाओं को पूरे वर्ष सम्बोधित करते रहे। इन सभाओं में पहली प्रमुख सभा सन् 1855 के आरम्भ में हरिद्वार में हुई। इस सभा में भारत के अन्तिम मुगल सम्राट् बहादुरशाह जफर के पुत्र फिरोजशाह, अजीमुल्ला खाँ, रंगू बापू आदि डेढ़ हजार के लगभग लोग सम्मिलित हुए। इन सभी ने पूरे देश मे स्वतंत्रता के लिए लोगों मे जोश भरना प्रारंभ किया और  सभी को इस यज्ञ मे सहयोग करने का आह्वान किया जिससे पूरे देश मे स्वतंत्रता हेतु माहौल बनने लगा। इसी प्रकार दूसरी सभा गढ़गंगा के मेले के अवसर पर गढ़ में गंगा के किनारे सम्पन्न हुई। लगभग ढाई हजार की उपस्थिति इस सभा में थी। तीसरी महत्त्वपूर्ण सभा अक्तूबर के अन्त में सन् 1855 में फिर हरिद्वार में हुई। इस सभा में 565 साधुओं ने और सकड़ों लोगों ने भाग लेकर स्वामी जी के उद्बोधन को सुना स्वामी जी ने कहा विदेशी शासन कितना भी अच्छा हो स्वदेशी से अच्छा नहीं हो सकता अतः अपने देश को स्वतंत्र करना है यह सुनकर लोगों मे जोश आ गया और देश के लिए तन मन धन से स्वतंत्रता की लड़ाई मे कूद गए। 1857 क्रांति की विफलता का कारण अति जोश और जल्द बाजी ही था। इस के बाद स्वामी दयानंद सामाजिक कार्यों मे अपना महत्व पूर्ण योगदान दिया।  
                    महर्षि दयानंद और उनके द्वारा निर्मित आर्य समाज के सिद्धांतों के कारण ही देश मे हजारों क्रांतिकारी हुए जैसे नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, मंगल पांडे, रानी लक्ष्मी बाई, राजा राव तुलाराम, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, दादाभाई नौरोजी, श्यामजी कृष्णवर्मा, स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपतराय, भाई परमानंद, वीर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. भीमराव अंबेडकर, चंद्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह आदि न जाने कितने बलिदानी स्वामी दयानंद व सत्यार्थ प्रकाश ने पैदा किए। महर्षि दयानंद स्वतंत्रता अभियान के प्रथम संवाहक थे। स्वराज्य और स्वतंत्रता की मूल अवधारणा हमें उन्हीं से प्राप्त हुई थी।

About Post Author

आपने शायद इसे नहीं पढ़ा

Subscribe to get news in your inbox