नजफगढ़ मेट्रो न्यूज़/विक्की झा– शनिवार का दिन शास्त्रों में सूर्यपुत्र शनिदेव की पूजा और अर्चना के लिए शुभ दिन माना जाता है, शनिदेव की पूजा करने से शनि दोष, साढ़ेसाती और ढेय्या जैसे दोषों से राहत मिलती है। कलयुग में शनि देव कर्म फल दाता और न्याय के देवता है, चाहे मनुष्य हो या कोई गंधर्व सभी के कर्मों के अनुसार फल और दंड देने का कार्य सिर्फ शनिदेव कर सकते हैं। शनि देव की दृष्टि से कोई नहीं बच सकता, कुंडलियों में नवग्रह होते हैं, उन ग्रहों के साथ अपनी मित्रता और शत्रुता के आधार पर, शनि देव अच्छे या बुरे फल देते हैं। शनिदेव की कुदृष्टि से बचने और उनकी पीड़ाओं से राहत पाने के लिए कई सारे उपाय हैं, आज हम आपको उन्हीं सभी उपायों के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी देंगे।
ज्योतिष शास्त्र द्वारा शनि देव को नवग्रह में सातवां स्थान प्राप्त हैं। ग्रहों में सबसे धीमी चाल शनिदेव की ही है, शनिदेव को एक राशि से दूसरी राशि में जाने में लगभग ढाई वर्ष का समय लगता है। शनिदेव जब सीधी चाल चले तो उसे मार्गी और उल्टी चाल चले तो उसे वक्री कहते हैं। सारे के सारे 12 राशियों के जातक को अपनी ढैय्या, साढ़ेसाती, दशा या फिर चाल से सिर्फ शनिदेव ही प्रभावित करते हैं। मूल रूप से शनि देव को आयु, पीड़ा, लोहा, खनिज, तेल, सेवक, कर्मचारी, विज्ञान आदि का कारक ग्रह माना जाता है।शनिदेव के मित्र ग्रहों में शुक्र और बुध को स्थान मिला हैं। गुरु ग्रह के साथ उनके समान भाव है इसीलिए उनकी गिनती शत्रुओं में नहीं की जा सकती।
हालांकि सूर्य शनि देव के पिता है, फिर भी शनिदेव के शत्रुओं में सबसे ऊपर नाम सूर्य, चंद्रमा और मंगल का ही आता है। सूर्य ग्रह से शनि की अनबन और शत्रुता का कारण शनिदेव की मां से सूर्य का बर्ताव बताया जाता है। मकर और कुंभ यह दोनों शनिदेव की राशियों में से एक है, मकर और कुंभ के स्वामी स्वयं शनिदेव हैं। शनि की उच्च राशि तुला और नीच राशि मेष है, साथ ही शनि देव हमेशा से अनुराधा, पुष्य एवं उत्तराभाद्रपद इन तीनों नक्षत्रों के भी स्वामी भी माने जाते हैं। मेष कर्क सिंह एवं वृश्चिक राशि के जातकों पर शनिदेव का प्रभाव और प्रकोप ज्यादा देखने को मिलता है, क्योंकि इन राशियों के स्वामी क्रमशः वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल, कर्क के चंद्रमा, और सिंह के स्वयं सूर्य हैं, इसीलिए हमेशा इन ग्रहों से और इन राशियों से शनि का शत्रुता का भाव रहता है। धनु और मीन के स्वामी ग्रह गुरु है, और गुरु के साथ शनिदेव का समभाव है, इसीलिए इन राशि के जातकों को शनि देव के मिले-जुले प्रभाव प्राप्त होते हैं।शनिवार के दिन शनिदेव के मंदिर में तेल और तिल के अर्पण से आपके शनि दोष का निवारण होना कुछ हद तक संभव हो पाता है।


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