आरजेएस पीबीएच का 538वां राष्ट्रीय वेबिनार संपन्न

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August 24, 2026

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-शिक्षा के जरिए सामाजिक बदलाव का आह्वान

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-  नई दिल्ली में सामाजिक जागरूकता और शिक्षा के महत्व को केंद्र में रखते हुए राम जानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस (आरजेएस पीबीएच) ने 11 अप्रैल 2026 को समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती के अवसर पर अपना 538वां राष्ट्रीय वेबिनार आयोजित किया। “सामाजिक क्रांति में शिक्षा की भूमिका” विषय पर केंद्रित इस कार्यक्रम में देशभर से जुड़े शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। वेबिनार का संचालन संस्थान के संस्थापक एवं राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने किया, जिन्होंने शिक्षा को समाज परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए इसके मूल उद्देश्यों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

फुले के विचारों और संघर्षों पर गहन चर्चा
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और सह-आयोजक, दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय से सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉ. जय भगवान दहिया ने महात्मा फुले के जीवन और उनके संघर्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस प्रकार जातिगत भेदभाव की एक घटना ने फुले के जीवन को बदल दिया और उन्हें सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष के मार्ग पर अग्रसर किया। डॉ. दहिया ने फुले के शिक्षा मॉडल को आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ते हुए बताया कि उन्होंने किसानों और श्रमिकों के लिए रात्रि विद्यालय खोलकर उन्हें आधुनिक कृषि तकनीक, बेहतर बीज, जल प्रबंधन और पशुपालन की जानकारी दी, जो उस दौर में अत्यंत क्रांतिकारी पहल थी।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर उठे सवाल
मुख्य अतिथि प्रोफेसर रवींद्र नाथ श्रीवास्तव (परिचय दास) ने समकालीन शिक्षा व्यवस्था पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि आज के दौर में “सूचना” को ही “शिक्षा” और “डिग्री” को “ज्ञान” समझ लिया गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि बढ़ती साक्षरता और उच्च डिग्रियों के बावजूद समाज में नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का ह्रास हो रहा है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।

महिला शिक्षा और सामाजिक प्रभाव पर विशेष जोर
वेबिनार में महिला वक्ताओं ने भी शिक्षा के सामाजिक प्रभावों पर अपने विचार रखे। नागपुर की डॉ. कविता परिहार ने सावित्रीबाई फुले के योगदान को याद करते हुए कहा कि आज की महिलाओं की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता उनके संघर्षों का परिणाम है। वहीं आईटीपीओ की पूर्व वरिष्ठ प्रबंधक स्वीटी पाल ने आधुनिक मातृत्व पर अपनी राय रखते हुए कहा कि भौतिकता की दौड़ में कई बार नैतिक शिक्षा की अनदेखी हो रही है, जिसे संतुलित करने की आवश्यकता है।

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से समृद्ध हुआ आयोजन
कार्यक्रम में कविता, संगीत और विचारों का भी समावेश देखने को मिला। कवि आर.एस. सुंदरम ने महात्मा फुले पर आधारित अपनी रचना प्रस्तुत की, जबकि लोक गायक दयाराम सरोलिया ने संत कबीर और फुले के विचारों के बीच समानताओं को उजागर किया। राकेश मनचंदा ने फुले के तर्कवादी दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सच्ची शिक्षा व्यक्ति को सही और गलत का अंतर समझने की क्षमता देती है।

शिक्षा और समाज के बीच संबंध पर महत्वपूर्ण चर्चा
कार्यक्रम के दौरान एक प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें उदय कुमार मन्ना ने समाज में नैतिक गिरावट के कारणों पर सवाल उठाया। इसके उत्तर में डॉ. दहिया ने कहा कि समस्या शिक्षा में नहीं, बल्कि उसके सिद्धांतों के अनुपालन में है। उन्होंने कहा कि ईमानदारी और नैतिकता का मार्ग कठिन होता है, इसलिए अधिकांश लोग इससे बचते हैं, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव की गति धीमी पड़ जाती है।

आगामी कार्यक्रमों की घोषणा
वेबिनार के अंत में उदय कुमार मन्ना ने आने वाले कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया कि 14 अप्रैल को डॉ. बी.आर. अंबेडकर की जयंती पर एक विशेष वेबिनार आयोजित किया जाएगा। इसके अलावा 17 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर “लिविंग हेरिटेज एंड इमरजेंसी रिस्पांस” विषय पर एक महत्वपूर्ण सत्र आयोजित होगा। इससे पहले 12 अप्रैल को पटना में जनक दुलारी देवी की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन भी प्रस्तावित है।

इस पूरे आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि समाज में वास्तविक परिवर्तन के लिए शिक्षा को केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक चेतना का आधार बनाना होगा।

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