100 साल का आरएसएस का सफर

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February 13, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

-एक बीज से वटवृक्ष तक का विस्तार

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/- साल 1925 में विजयदशमी के पावन अवसर पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में महज़ पांच स्वयंसेवकों के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की नींव रखी। उनका उद्देश्य था युवाओं को शारीरिक, मानसिक और वैचारिक रूप से सशक्त बनाकर राष्ट्रसेवा के लिए तैयार करना। 28 मई 1926 को मोहिते वाडा की ऐतिहासिक धरती पर पहली शाखा आयोजित की गई, जिसमें 15-20 युवा खाकी वर्दी में अनुशासित अभ्यास करते दिखाई दिए। यह शाखा केवल एक बैठक नहीं, बल्कि उस विचार की शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर संघ को भारत की सबसे मज़बूत सामाजिक-सांस्कृतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया।

डॉ. हेडगेवार का मानना था कि भारत की असली कमजोरी बाहरी ताक़तों में नहीं, बल्कि हिंदू समाज की आंतरिक विभाजनों और विखंडन में है। इसी सोच ने शाखा को संघ की मूल आत्मा बनाया। एक सदी बाद, आरएसएस अपने अनुशासन और संगठनात्मक ढांचे के कारण देश की राजनीतिक और सामाजिक धारा में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। भारतीय जनता पार्टी जैसी राजनीतिक इकाई इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

संघर्ष, विस्तार और आधुनिक रूपांतरण

संघ की यात्रा आसान नहीं रही। आज़ादी के बाद गांधीजी की हत्या के बाद उस पर प्रतिबंध लगा, लेकिन संगठन ने अपनी वैचारिक जड़ों को छोड़े बिना खुद को नए रूप में ढाला। गुरु गोलवलकर से लेकर बालासाहेब देवरस तक, हर प्रमुख ने संघ की शाखाओं और विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाया। आपातकाल का विरोध, राम मंदिर आंदोलन, सामाजिक समरसता अभियान और स्वदेशी का आह्वान—इन सबने आरएसएस को केवल एक सांस्कृतिक संगठन से कहीं अधिक बड़ा स्वरूप दिया।

21वीं सदी में मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ ने न सिर्फ शाखाओं का विस्तार किया बल्कि आधुनिक मुद्दों पर भी अपनी भूमिका दर्ज कराई। महिलाओं की भागीदारी पर जोर, जातीय असमानता के खिलाफ कार्यक्रम, अनुच्छेद 370 की समाप्ति और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण—ये सब संगठन के ऐतिहासिक पड़ाव रहे। वर्तमान समय में 80 हज़ार से अधिक शाखाओं के साथ आरएसएस विचारधारा और संगठनात्मक शक्ति का वह केंद्र बन चुका है, जिसने भारत की राजनीति और समाज दोनों को गहराई से प्रभावित किया है।

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