सच्चे प्रेम की प्रतीकः सबरी और उर्मिला की अमर कहानी

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October 19, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

सच्चे प्रेम की प्रतीकः सबरी और उर्मिला की अमर कहानी

बिन भ्रमर के कहां खिल सकी है कली
फिर बहारों का मिलना कहाँ भाग्य में
दो किनारे कहां मिल सके हैं कभी
दो किनारो का मिलना कहां भाग्य में
मन की कुटिया बुहारे हुये एक सती,
                   बन के सबरी लिये बेर बैठी रही
राम के राह पर वो बिछा के नयन,
  द्वार पर ही बहुत देर बैठी रही l

प्रेम मानक को कोई कैसे गढ़ता भले
        भावनायें वचन की जो ना शुद्ध हो
 प्रीत के पत्र कोई कैसे पढता भले
        जब हृदय द्वार पहले से अवरुद्ध हो
भाव कैसे वो पहुँचाती  अंतस तलक
                        चिट्ठीयों के लिए ढेर बैठी रही
राम के राह पर वो बिछा के नयन,
  द्वार पर ही बहुत देर बैठी रही l

 राम के संग वन में लखन जो गये
 आंख बहती हुई एक नदी हो गई
 राम के साथ तो संगिनी थी मगर
 उर्मिला की सकल जिंदगी खो गई
पूरे चौदह बरस बिरहनी उर्मिला
              ले के किस्मत का बस फेर बैठी रही
राम के राह पर वो बिछा के नयन,
  द्वार पर ही बहुत देर बैठी रही l

मनीष मधुकर 

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