राजनीतिक पार्टियों के चंदे पर फिर रार, चुनाव आयोग ने चंदे पर लगाम की तरफ बढ़ाए कदम

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राजनीतिक पार्टियों के चंदे पर फिर रार, चुनाव आयोग ने चंदे पर लगाम की तरफ बढ़ाए कदम

-पार्टियाँ बीस करोड़ रु. तक का चंदा भी नक़द क्यों लें? पाई-पाई का हिसाब लेना चाहिए

नई दिल्ली/- देश में एकबार फिर राजनीतिक पार्टियों के चंदे को लेकर रार शुरू हो गई है। एक तरफ जहां चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टियों के चंदे को लेकर लगाम कसने की तरफ कदम बढ़ा रहा है वहीं पूरे देश में काले धन को सफेद में बदलने वाले राजनीतिक पार्टियों के चंदे पर बहस छिड़ गई है। दरअसल, चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर लगाम कसने की तरफ कदम बढ़ाए हैं। सिफ़ारिश की गई है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी दो हज़ार रुपये से ज्यादा का चंदा चेक या डिजिटली ही ले। नक़द नहीं। इसके अलावा विदेश से मिलने वाले चंदे को अलग रखा जाए।
            अभी तक नक़द चंदे की सीमा बीस हज़ार है। पार्टियाँ बड़ी चतुर हैं। वे बीस-बीस हज़ार के टुकड़ों में करोड़ों का चंदा ले लेती हैं। इसलिए चुनाव आयोग ने यह सिफ़ारिश भी की है कि कुल चंदे का बीस प्रतिशत या बीस करोड़ रुपए, इसमें से जो भी कम हो, उतना ही चंदा नक़द लिया जा सकता है। वजह यह है कि जिन पार्टियों ने नक़द चंदा ज़ीरो दिखा रखा है, उनके खातों में भी करोड़ों का झोल है। सवाल यह है कि कोई भी पार्टी नक़द चंदा ले ही क्यों? और अगर ले तो उसका भी हिसाब क्यों न दे? उस पर भी टैक्स क्यों न दे? बीस करोड़ का चंदा यानी इसके टैक्स की माफ़ी!
            आम आदमी से तो पाई-पाई का हिसाब लिया जाता है। थोड़ी सी गड़बड़ अगर निकल आए तो बाक़ायदा छापों पर छापे! फ़ाइन। यहाँ तक कि ज़ब्ती। खाते सील। लेन-देन पर बाज जैसी नज़र। फिर राजनीतिक पार्टियों पर इतनी मेहरबानी क्यों?
            और इनके कारनामे तो देखिए! बिना टैक्स के पैसे से चुनाव जीत कर आते हैं और लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद और विधानसभाओं में बेतुका हंगामा करते रहते हैं। अपशब्दों का प्रयोग तो जैसे इनका जन्म सिद्ध अधिकार हो गया हो! केवल सांसद या विधायक बने रहें तो इनको मिलने वाली निधि पर ही इनका वश चलता है और वे इसी के इस्तेमाल में मनमानी करने को मानो स्वतंत्र होते हैं। अगर जो मंत्री बन जाएँ, फिर तो क्या पूछना! न कोई पूछने वाला, न कोई कुछ कहने वाला! जवाबदारी नाम के शब्द को तो सारे नेता घोल कर पी गए हैं।
              बात सिर्फ़ जवाबदारी और जवाबदेही की करते हैं लेकिन इन पर अमल कोई नहीं करता। चुनाव आयोग के लिए संसद को कुछ ऐसे नियम-क़ानून भी बनाने चाहिए कि जो नेता जीतकर अपनी जवाबदारी से मुकर जाए, जो सही मायनों में लोगों के प्रति अपनी जवाबदेही को पूरा न करे, उसका निर्वाचन ही रद्द कर दिया जाए। निर्वाचन रद्द करने से याद आया कि झारखण्ड के मुख्यमंत्री के निर्वाचन रद्द करने की पर्ची वहाँ के राज्यपाल अपनी कुर्सी के नीचे दबाए बैठे हैं। महीना हो चला! राज्यपाल महोदय टस के मस नहीं हो रहे हैं। जाँच और कार्रवाई में चुनाव आयोग ने बड़ी जल्दबाज़ी दिखाई लेकिन उस जल्दबाज़ी को अब क्यों ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है? आख़रि महामहिम किस वक्त का इंतज़ार कर रहे हैं? हालाँकि यह उनका अधिकार है। वे जब तक चाहें चिट्ठी दबा सकते हैं! क़ानून की ऐसी गलियाँ बंद होनी चाहिए।

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