बहादुरगढ़ में हुआ भव्य कवि सम्मेलन आयोजन

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बहादुरगढ़ में हुआ भव्य कवि सम्मेलन आयोजन

-हरियाणा साहित्य अकादमी एवं कलमवीर विचार मंच ने किया आयोजित, दिल्ली, हरियाणा व उत्तरप्रदेश की कवियों ने बांधा समा                
नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- हरियाणा साहित्य अकादमी एवं कलमवीर विचार मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कवि सम्मेलन में दिल्ली, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के अनेक कवियों ने विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर रोचक व सारगर्भित रचनाएं सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। देश के जाने माने साहित्यकार ज्ञान प्रकाश विवेक की अध्यक्षता में हुए इस काव्योचित में हरियाणा ट्रेडर्स वैलफेयर बोर्ड के जिला अध्यक्ष अशोक गुप्ता मुख्य अतिथि व सीएम विंडो एमिनेंट दिनेश शेखावत, युवा शिक्षाविद नेहा यादव,नप के पूर्व उपाध्यक्ष धर्मबीर वर्मा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। लगभग चार घंटे तक चले इस कार्यक्रम का संचालन गुरुग्राम के चर्चित हरियाणवी हास्य कवि सुंदर कटारिया ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि व आगंतुक कवियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर किए गए माल्यार्पण से हुआ।
                 मुख्य अतिथि अशोक गुप्ता ने अपने संबोधन में संस्था द्वारा पिछले कई दशकों से किए जा रहे साहित्यिक आयोजनों का हवाला देते हुए इसे समाज को दिशा देने की दिशा में उठाया गया सकारात्मक कदम बताया। काव्योत्सव के दौरान मंचासीन अतिथियों सहित सभी प्रतिभागियों को पुष्पहार, अंगवस्त्र व आकर्षक स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। काव्योत्सव मैं राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि ज्ञान प्रकाश विवेक,डॉ.चेतन आनंद गाज़ियाबाद, रजनी अवनी दिल्ली, सुंदर कटारिया गुरुग्राम, विरेन्द्र मधुर रोहतक, विकास यशकीर्ति व श्याम वशिष्ठ भिवानी सहित सतपाल स्नेही, कृष्ण गोपाल विद्यार्थी, कुमार राघव,सुनीता सिंह,  विरेन्द्र कौशिक, अनिल भारतीय, कौशल समीर,मोहित कौशिक आदि ने अपनी शानदार प्रस्तुति से खूब वाहवाही बटोरी। कार्यक्रम का समापन सभागार में उपस्थित सभी लोगों के सामूहिक रात्रिभोज के साथ हुआ।

कवि सम्मेलन में सुनाई गई कुछ कविताओं की बानगी प्रस्तुत है….

वो जो धरती पे भटकता रहा जुगनू बनकर,
कहीं आकाश में होता तो सितारा होता।
– ज्ञान प्रकाश विवेक, बहादुरगढ़

समुन्दर बनके तो हरगिज़ तुम्हारा हो नहीं सकता,
मुझे दरिया ही रहने दो मैं खारा हो नहीं सकता।
मैं मिट्टी की तरह मिट्टी से जुडना जानता हूं बस,
मैं उस मगरूर अंबर का सितारा हो नहीं सकता।
डॉ.चेतन आनंद, गाज़ियाबाद

आओ मिलकर फसल उगाएं रिश्तों की दोबारा,
रोशन हो जाए हर जीवन,दूर हटे अंधियारा।
– वीरेंद्र ’मधुर’ रोहतक

ये जो हमदर्दी दिखलाने वाले हैं,
फिर से कोई ज़ख्म लगाने वाले हैं।
पानी का धंधा करते हैं लोग यहां,
मैं ये समझा प्यास बुझाने वाले हैं।
-श्याम वशिष्ठ, भिवानी

छोड़ के सुख जो राजमहल का जंगल जंगल घूमे थे,
मात-पिता के चरण जिन्होंने निज नयनों से चूमे थे।
जिन्होंने वन की धूल को समझा कि माथे का चंदन है,
ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु राम को वंदन है।
-रजनी अवनी, दिल्ली

मधुर शहनाई में हम काश ग़म के खार न बोते,
बनी जब लाडली दुल्हन,न आंसू हौसला खोते।
विदा होते हुए मुझको बड़ी लगने लगी बिटिया,
कहां जब पोंछ कर आंसूं कि पापा यूं नहीं रोते।
-विकास यशकीर्ति, भिवानी

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