गुरुग्राम/उमा सक्सेना/- गुरुग्राम स्थित श्री गुरु गोबिंद सिंह त्रिशताब्दी विश्वविद्यालय (एसजीटीयू) में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “चेंजिंग डायमेंशन्स ऑफ इंडिया’ज नैरेटिव डिप्लोमेसी” का प्रभावशाली समापन हुआ। इस सम्मेलन में सात देशों तथा भारत के 22 राज्यों से आए विद्वानों, कूटनीतिज्ञों और नीति-विशेषज्ञों ने बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की कथानक-आधारित कूटनीति पर गहन विमर्श किया। कार्यक्रम में 75 से अधिक विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और नीति-निर्माण से जुड़े संगठनों की सक्रिय भागीदारी दर्ज की गई।
यह आयोजन विश्वविद्यालय की फैकल्टी ऑफ ह्यूमैनिटीज, सोशल साइंसेज एंड लिबरल आर्ट्स द्वारा भारतीय विश्व मामलों की परिषद के सहयोग और Indian भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के प्रायोजन में संपन्न हुआ। दो दिनों तक चले इस शैक्षणिक संवाद में यह स्पष्ट किया गया कि भारत की वैश्विक भूमिका अब केवल पारंपरिक शक्ति-संतुलन तक सीमित नहीं है, बल्कि धारणा-निर्माण, सांस्कृतिक प्रभाव और रणनीतिक संप्रेषण के माध्यम से भी सशक्त हो रही है।
उद्घाटन सत्र: पारंपरिक कूटनीति से ‘बहु-सत्य’ की ओर
कार्यक्रम की संयोजक डॉ. नंदिनी बसिष्ठा ने स्वागत संबोधन में कहा कि आज की कूटनीति केवल औपचारिक संवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि भोजन परंपराओं, प्रवासी समुदायों और सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के जरिए बहु-आयामी रूप ले चुकी है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) हेमंत वर्मा ने अपने उद्बोधन में समकालीन भू-राजनीतिक परिस्थितियों में भारत की नैरेटिव कूटनीति की बढ़ती प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।
तकनीकी सत्रों में विविध आयामों पर शोध प्रस्तुत सम्मेलन के विभिन्न तकनीकी सत्रों में बड़ी संख्या में शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
प्रथम सत्र “इंडिया’ज नैरेटिव डिप्लोमेसी: थ्योरी एंड प्रैक्सिस” में 19 शोधपत्रों के माध्यम से धर्म, सतत विकास और संवैधानिक नैतिकता को भारत की सॉफ्ट पावर के प्रमुख आधार के रूप में रेखांकित किया गया।
द्वितीय सत्र में विभिन्न देशों की नैरेटिव रणनीतियों और उनकी नैतिक संरचनाओं की तुलनात्मक समीक्षा की गई।
तृतीय सत्र में बॉलीवुड को भारत की सांस्कृतिक सॉफ्ट पावर का प्रभावी माध्यम बताते हुए उसकी वैश्विक छवि पर चर्चा हुई।
चतुर्थ सत्र में बौद्ध कूटनीति, पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरणीय सॉफ्ट पावर और कौटिल्य के रणनीतिक विचारों को समकालीन संदर्भों से जोड़ा गया।
दूसरे दिन आयोजित पैनल चर्चा “चेंजिंग डायमेंशन्स ऑफ इंडिया’ज नैरेटिव डिप्लोमेसी” में प्रो. एस. डी. मुनी, लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) जे. एस. सोढ़ी, डॉ. संपा कुंडू, प्रो. रामदास रुपावत, प्रो. (डॉ.) अलका पारिख, प्रो. सरोज कुमार वर्मा, डॉ. रवि रमेशचंद्र शुक्ल और डॉ. गिरिशंकर एस. बी. नायर ने वैश्विक परिदृश्य में भारत की रणनीतिक, सांस्कृतिक और डिजिटल कूटनीति पर अपने विचार रखे। सत्र का संचालन डॉ. अमित के सुमन ने किया।
इसके अतिरिक्त, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, भाषा-राजनीति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दुष्प्रचार, हरित विकास, लोकतांत्रिक मूल्य, पाक-कूटनीति, समुद्री रणनीति, गठबंधन राजनीति और एआई नैतिकता जैसे विषयों पर भी गंभीर विमर्श हुआ। ऑनलाइन सत्र में 50 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें गांधीवादी और बौद्ध नैतिक कूटनीति, यूपीआई का अंतरराष्ट्रीयकरण, इंडो-पैसिफिक रणनीति तथा सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा चुनौतियों पर चर्चा की गई।
समापन समारोह और पुरस्कार वितरण
समापन सत्र में मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) शोकीन चौहान और विशिष्ट अतिथि पूर्व राजदूत अशोक सज्जनहार ने अपने विचार रखते हुए कहा कि बदलते वैश्विक परिवेश में भारत की कथानक-आधारित कूटनीति दीर्घकालिक प्रभाव डाल रही है।
कार्यक्रम के अंत में उत्कृष्ट शोध कार्यों को सम्मानित किया गया। सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र, स्नातकोत्तर श्रेणी और इंटर्न श्रेणी में प्रतिभागियों को पुरस्कार प्रदान किए गए।
दो दिवसीय इस सम्मेलन ने यह स्थापित किया कि आज के दौर में ‘नैरेटिव डिप्लोमेसी’ केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी है। अकादमिक जगत और नीति-निर्माताओं के बीच यह संवाद भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि और सॉफ्ट पावर को सुदृढ़ करने की दिशा में एक सार्थक पहल साबित हुआ।


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