नेहरू ने क्यों ठुकराया नेपाल का भारत में विलय प्रस्ताव?

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नेहरू ने क्यों ठुकराया नेपाल का भारत में विलय प्रस्ताव?

-इतिहास के पन्नों से निकलकर सामने आई सच्चाई

नई दिल्ली/सिमरन मोरया/-  नेपाल ने तख्तापलट हो चुका है। केपी ओली पीएम पद से इस्तीफा दे चुके हैं। इस बीच इतिहास से जुड़े एक दावे को लेकर फिर बहस छिड़ गई है। जवाहरलाल नेहरू को लेकर ये दावा अक्सर किया जाता है कि नेपाल 1951 में अपना विलय भारत में करना चाहता था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर बहस जारी है। लोग दावा कर रहे हैं कि नेपाल के राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह नेपाल का विलय भारत में करना चाहते थे। आइए जानते हैं कि इस दावे की सच्चाई क्या है।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा ‘द प्रेसिडेंशियल इयर्स’ में लिखा था कि नेहरू ने इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया। पुस्तक के अध्याय 11 में ‘माई प्राइम मिनिस्टर्स: डिफरेंट स्टाइल्स, डिफरेंट टेम्परमेंट्स’ शीर्षक वाले खंड में मुखर्जी लिखते हैं कि अगर इंदिरा गांधी नेहरू की जगह होतीं तो शायद उन्होंने इस मौके का फायदा उठाया होता, जैसा उन्होंने सिक्किम के मामले में किया था।

एक ही पार्टी, लेकिन हर PM की अपनी कार्यशैली
प्रणब मुखर्जी ने पूर्व प्रधानमंत्रियों की नेतृत्व शैली का विश्लेषण करते हुए नेहरू की सतर्क कूटनीति को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हर प्रधानमंत्री की अपनी कार्यशैली होती है। लाल बहादुर शास्त्री ने ऐसा काम किया, जो नेहरू के काम से बिल्कुल अलग था। प्रधानमंत्री, भले ही वे एक ही पार्टी से हों, लेकिन विदेश नीति, सुरक्षा और आंतरिक प्रशासन जैसे मुद्दों पर अलग-अलग धारणाएं रख सकते हैं।

क्या कहती है 1950 की भारत-नेपाल संधि
इन दावों की पृष्ठभूमि 1950 की भारत-नेपाल संधि से भी सामने आती है, जिस पर भारत के प्रतिनिधि चंद्रशेखर प्रसाद नारायण सिंह और नेपाली प्रधानमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में दोनों पड़ोसियों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा सहयोग की रूपरेखा तय की गई थी।

राजा ने ही की लोकतंत्र बहाली की कोशिश
जब राजा त्रिभुवन 1951 में नेपाल लौटे और सदियों पुराने राणा प्रभुत्व को समाप्त किया, तो उन्होंने संवैधानिक लोकतंत्र की बहाली की कोशिश की। इस दौरान नेपाली कांग्रेस और भारत के बीच संबंध भी प्रगाढ़ हुए। त्रिभुवन की भारत पर निर्भरता और घनिष्ठ एकीकरण के उनके प्रयासों को अक्सर इस बात के प्रमाण के रूप में उद्धृत किया जाता था कि विलय पर कभी विचार किया जा रहा था।

संयुक्त प्रयासों से ही विद्रोह की सफलता
नेपाली कांग्रेस ने 1950 में राणा शासन को उखाड़ फेंकने के लिए क्रांति की घोषणा की, और राजा त्रिभुवन ने कांग्रेस और राणा वंश के लोकतंत्र समर्थक गुटों, दोनों के साथ गठबंधन कर लिया। नेपाली लेखक अमीश राज मुल्मी ने तर्क दिया है कि इस विद्रोह की सफलता केवल संयुक्त प्रयासों से ही संभव थी। 1951 तक, त्रिभुवन ने सत्ता संभाल ली थी और एक अंतरिम संविधान के तहत एक सीमित लोकतांत्रिक ढांचा स्थापित कर दिया था।

इस दावे का खंडन करते हैं इतिहासकार
इतिहासकारों और राजनयिकों ने लंबे समय से इस दावे का खंडन किया है कि नेहरू ने औपचारिक विलय प्रस्ताव ठुकरा दिया था। आलोचकों का कहना है कि विदेश मंत्रालय के अभिलेखागार में ऐसा कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं है जिससे पता चले कि राजा त्रिभुवन ने कभी संप्रभुता छोड़ने की पेशकश की थी। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि त्रिभुवन भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों के पक्षधर थे, लेकिन नेहरू, पश्चिमी, खासकर ब्रिटिश और अमेरिकी, के संभावित हस्तक्षेप से चिंतित थे, और इस बात पर जोर देते थे कि नेपाल को अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखनी चाहिए। जैसा कि एक विदेश नीति पत्र में लिखा गया था कि कोई भी अपनी स्वतंत्रता और पहचान नहीं छोड़ना चाहता। नेहरू इस दृष्टिकोण में दृढ़ विश्वास रखते थे।

भारत के साथ निकटता के पक्ष में थे त्रिभुवन
भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत लोक राज बराल ने भी इस कहानी पर सवाल उठाया है। उनके अनुसार उन्हें नहीं लगता कि राणा नेपाल का भारत में विलय चाहते थे। उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है। हां, त्रिभुवन जरूर भारत के साथ निकटता के पक्ष में थे। बराल का कहना है कि कुछ लोगों का मानना है कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेपाल को भारत में मिलाने का सुझाव दिया था। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इस दावे का भी कोई प्रमाण नहीं है।

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