छोटी दिवाली पर क्यों जलते हैं गोबर के दीये? जानें इसका रहस्यमयी महत्व

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March 4, 2026

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छोटी दिवाली पर क्यों जलते हैं गोबर के दीये? जानें इसका रहस्यमयी महत्व

मानसी शर्मा/-  छोटी दिवाली, जिसे नरक चतुर्दशी या काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है, दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव का दूसरा दिन है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। 2025में यह 19अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन घरों में दीप जलाने की परंपरा है, लेकिन विशेष रूप से गाय के गोबर से बने दीये जलाने का रिवाज अनोखा महत्व रखता है। ये दीप न केवल पर्यावरण अनुकूल हैं, बल्कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सुख-शांति लाते हैं।

छोटी दिवाली कब मनाई है?

हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को छोटी दिवाली मनाई जाती है। साल 2025में यह तिथि 19अक्टूबर को दोपहर 1:51बजे शुरू होकर 20अक्टूबर को दोपहर 3:44बजे समाप्त होगी। अब पूजा रात के समय होगी, छोटी दिवाली 19अक्टूबर को ही मनाई जाएगी।

 क्यों मनाई जाती है छोटी दिवाली?

यह पर्व भगवान कृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध की स्मृति में मनाया जाता है। नरकासुर ने देवताओं और निर्दोषों पर अत्याचार किए थे, लेकिन कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिलकर उसे पराजित किया। इस विजय ने अंधकार पर प्रकाश की जीत का संदेश दिया। छोटी दिवाली पर अभ्यंग स्नान, यम पूजा और दीप प्रज्वलन जैसे रिवाज निभाए जाते हैं, जो आत्मशुद्धि और नरक भय से मुक्ति प्रदान करते हैं।

गोबर के दीये जलाने की अनोखी परंपरा

छोटी दिवाली पर गाय के गोबर से बने दीये जलाने का रिवाज प्राचीन है। गाय को हिंदू धर्म में माता के समान माना जाता है, और उसका गोबर पवित्र तथा शुद्धकारी तत्व है। ये दीये मिट्टी के सामान्य दीयों से अलग होते हैं, क्योंकि गोबर में प्राकृतिक जीवाणुनाशक गुण होते हैं, जो वातावरण को शुद्ध करते हैं। पर्यावरण के लिहाज से भी ये आदर्श हैं, क्योंकि ये जैविक और प्रदूषण-मुक्त हैं।

गोबर के दीये जलाने की परंपरा से जुड़ी मुख्य कथा यमराज के वरदान से प्रेरित है। पुराणों के अनुसार, एक बार यमराज ने भक्तों को दर्शन दिए और कहा कि जो व्यक्ति कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (नरक चतुर्दशी) के दिन दक्षिण दिशा में गाय के गोबर का दीपक जलाएगा, वह मृत्यु के बाद नरक के द्वार से नहीं गुजरेगा। यह वरदान इसलिए दिया गया क्योंकि गोबर गाय का है, जो धर्म का प्रतीक है, और यह दीपक अंधकार (नरक) को दूर करने का माध्यम बनता है।

कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक भक्त ने यम पूजा के दौरान गोबर का दीपक जलाया। यमराज प्रसन्न हुए और बोले, “यह दीपक तुम्हारी भक्ति का प्रतीक है। गोबर की शुद्धता से तुम्हारा जीवन पापमुक्त रहेगा, और नरक का भय कभी स्पर्श नहीं करेगा।” इस वरदान से प्रेरित होकर यह रिवाज चला आ रहा है। एक अन्य मान्यता यह भी है कि ये दीये नरकासुर के वध के बाद फैली नकारात्मकता को शांत करने के लिए जलाए जाते थे, जो कृष्ण की विजय को मजबूत बनाता है।

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