-आजाद की डिनर पार्टी में नही पंहुचे 8 सदस्य, गुट में फूट की जताई जा रही आशंका
नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद एकबार फिर कांग्रेस का असंतुष्ट गुट जी-23 सक्रिय हो गया है। गुट के सदस्य एक बार फिर पार्टी नेतृत्व में परिवर्तन को लेकर मुखर हो गये है। लेकिन पीके की मीटिंग के बाद जहां कांग्रेस एक जुट दिखाई दी वहीं गुट पर इस बैठक का असर साफ दिख रहा है। हालांकि गुट में चार नये सदस्य शामिल हुए है जिनमें दो ऐसे सदस्य भी है जो कांग्र्रेस छोड़ चुके है। लेकिन हाल ही में हुई गुलाम नबी आजाद के घर डिनर पार्टी में इस गुट के 8 सदस्य नदारद दिखे। ंजिससे यह चर्चा जोर पकड़ गई कि गुट में दरार पड़ गई है। लेकिन गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हम कांग्रेसी है और कांग्रेस की भलाई के लिए काम करते रहेंगे फिर कोई आये या जाये कोई फर्क नही पड़ता।
इस गुट की स्थापाना अगस्त 2020 में हुई थी जिसमें 23 नेता शामिल थे। गुट के सभी सदस्य कांग्रेस में रहकर कांग्रेस की विचारधारा व उसकी भलाई के लिए हटकर काम कर रहे थे और लगातार कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की मांग करते रहे है। जिसकारण इन्हे असंतुष्ट गुट का नाम भी दिया गया था। अभी तक गुट के नेता पूरी तरह से एकजुट दिखाई दे रहे थे लेकिन अब जी-23 से आठ कांग्रेसियों ने खुद को अलग कर लिया है, जबकि एक नेता जितिन प्रसाद ने यूपी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा का दामन थाम लिया था। असंतुष्ट खेमे में अब केवल 14 नेता ही बचे हैं। इनमें गुलाम नबी आजाद, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और पृथ्वीराज चव्हाण पूर्व सीएम रह चुके हैं। इनके अलावा ज्यादातर नेताओं का राज्यसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है या खत्म होने वाला है।
हालांकि, गुलाम नबी आजाद के घर बुलाई गई डिनर पार्टी में चार नए नेता भी शामिल हुए, लेकिन उनमें भी दो का कांग्रेस से नाता टूट चुका है। दिलचस्प यह है कि पार्टी नेतृत्व ने प्रवक्ताओं को स्पष्ट किया है कि असंतुष्ट खेमे के नेताओं के खिलाफ कोई बयान नहीं देना है, जिससे उन्हें बोलने का मौका मिले।
गुलाम नबी आजाद : गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के जी-23 ग्रुप के अगुआ बनकर उभरे थे। ठश्रच् नेताओं से कथित नजदीकी के चलते वे सुर्खियों में भी रहते हैं। आजाद ने अपनी राजनीति की शुरुआत 80 के दशक में कश्मीर से की थी। गांधी परिवार के करीब रहे हैं। लंबे समय से राज्यसभा से ही चुनकर संसद आते रहे, लेकिन उनका कार्यकाल खत्म हो हो चुका है। फिर से राज्यसभा न भेजे जाने की बात शायद उन्हें परेशान कर रही है। वे एक बार जम्मू-कश्मीर के सीएम भी रहे, लेकिन उनकी जमीनी पकड़ मजबूत नहीं मानी जाती। केंद्र की ओर से इसी साल गुलाम नबी आजाद को पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया।
आनंद शर्मा : हिमाचल प्रदेश के रहने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा भी जी-23 में शामिल हैं। शर्मा भी लंबे समय से केवल राज्यसभा के जरिए संसद पहुंचते रहे हैं, लेकिन जिस तरह से आनंद शर्मा गांधी परिवार के खिलाफ मुखर हैं, उससे साफ है कि अब उन्हें शायद ही पार्टी की ओर से राज्यसभा जाने का मौका मिले। शर्मा मनमोहन सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं।
कपिल सिब्बल : पांच राज्यों में कांग्रेस की करारी हार के बाद कपिल सिब्बल ने गांधी परिवार से पार्टी नेतृत्व छोड़ने की सलाह दे डाली थी। सिब्बल ने कहा कि गांधी परिवार को अब कांग्रेस की लीडरशिप से हट जाना चाहिए और नेतृत्व की भूमिका के लिए और किसी और को मौका देना चाहिए। सिब्बल यूपी से राज्यसभा सदस्य भी हैं, लेकिन उनका कार्यकाल खत्म होने जा रहा है। वे जिस तरह से गांधी परिवार के खिलाफ मुखर हैं, उससे स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में राज्यसभा के लिए उन पर विचार शायद ही हो। वे राहुल गांधी को भी निशाने पर लेते रहे हैं। 2014 में वे दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़े थे, लेकिन हार गए थे।
भूपेंद्र हुड्डा : भूपेंद्र हुड्डा हरियाणा में 2005 से 2014 तक लगातार दो बार मुख्यमंत्री रहे, लेकिन इन दिनों वे भी असंतुष्ट हैं। हरियाणा कांग्रेस में उनके कद को कम करने की कोशिश से नाराज बताए जा रहे हैं। हरियाणा में हुड्डा की जमीनी पकड़ काफी मजबूत मानी जाती है। कांग्रेस के असंतुष्ट खेमे में हुड्डा ही सबसे अधिक ताकतवर नेता हैं।
राज बब्बर : यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके राज बब्बर भी असंतुष्ट खेमे में शामिल हैं। राज बब्बर कभी सपा में थे। बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए। वे न्च् में भी हाशिए पर हैं। एक तरह से उनकी भी कांग्रेस में सियासी पारी खत्म होती दिख रही है। वे कांग्रेस के लिए कोई खास करिश्मा नहीं कर पाए।
मनीष तिवारी : पंजाब के लुधियाना से मनीष तिवारी कांग्रेस के लोकसभा सांसद हैं। पार्टी में उपेक्षित चल रहे हैं। तिवारी कभी अमरिंदर सिंह के बेहद करीबी थे, लेकिन पिछले साल आई उनकी किताब ने बवाल मचा दिया। उस किताब में उन्होंने मुंबई आतंकी हमले के दौरान मनमोहन सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। वहीं पंजाब विधानसभा चुनाव में भी उनको स्टार प्रचारक की सूची में शामिल नहीं किया गया था। तिवारी को लेकर मिलते संकेतों से साफ है कि उनकी राह भी कुछ दिनों बाद कांग्रेस से जुदा हो सकती है। तिवारी भी कभी गांधी परिवार के बेहद करीबी रहे, लेकिन अब बागी खेमे के सक्रिय सदस्य हो गए हैं।
संदीप दीक्षित : संदीप दीक्षित पार्टी के असंतुष्ट खेमे के सबसे सक्रिय सदस्य के तौर पर उभरे हैं। वे दिल्ली से सांसद रह चुके हैं। पांच राज्यों में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद दीक्षित ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया। दिल्ली में कांग्रेस को लगातार हार मिल रही है। ऐसे में दीक्षित के लिए आगे की सियासत बेहद मुश्किल है। वे दिल्ली की पूर्व ब्ड शीला दीक्षित के बेटे हैं, लेकिन फिलहाल उनकी जमीनी पकड़ मजबूत नहीं है।
पीजे कुरियन : केरल के रहने वाले पीजे कुरियन 2018 में राज्यसभा से रिटायर हो चुके हैं। कांग्रेस हाईकमान की अनदेखी से असंतुष्ट हैं।
शशि थरूरः शशि थरूर केरल से 2009 से सांसद हैं। गांधी परिवार के करीबी हैं, लेकिन कुछ समय से असंतुष्ट खेमे में शामिल हैं। अलग-अलग कारणों से थरूर अक्सर सुर्खियों में रहते हैं।
राजिंदर कौर भट्टल : पंजाब की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं। 76 वर्षीय राजिंदर कौर पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से एक तरह से हाशिए पर हैं। ऐसी स्थिति में वे असंतुष्ट खेमे में शामिल हो गई हैं। पंजाब की राजनीति में उनका दखल बहुत कम है।
पृथ्वीराज चव्हाण : पृथ्वीराज चव्हाण नवंबर 2010 से सितंबर 2014 तक महाराष्ट्र के ब्ड थे। मोदी लहर में कांग्रेस की महाराष्ट्र में बुरी हार हुई थी। महाराष्ट्र कांग्रेस में चव्हाण एक तरह से साइड लाइन हैं। ऐसे में चव्हाण असंतुष्ट खेमे में शामिल हो गए हैं।
अखिलेश प्रसाद सिंह : अखिलेश प्रसाद सिंह बिहार से राज्यसभा सांसद हैं। वे मनमोहन सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। दो साल बाद उनका कार्यकाल खत्म हो जाएगा। तब उनका वापस राज्यसभा पहुंचना बेहद मुश्किल होगा। इसके पीछे वजह ये है कि बिहार में कांग्रेस विधायकों की अब इतनी संख्या नहीं रही कि बिहार से किसी को राज्यसभा भेजा जा सके।
विवेक तन्खा : कांग्रेस ने विवेक तन्खा को मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद बनाया है। उनका कार्यकाल इसी साल खत्म हो रहा है, लेकिन तन्खा जिस तरह से गांधी परिवार के विरोधी खेमे में शामिल हैं, उससे सवाल उठ रहे हैं कि क्या फिर से उनकी वापसी राज्यसभा में हो पाएगी। इसकी भी पार्टी के भीतर चर्चा हो रही है।
कुलदीप शर्मा : कुलदीप शर्मा हरियाणा की कांग्रेस सरकार में पूर्व विधानसभा स्पीकर थे। दो बार विधायक भी रह चुके हैं। वे हुड्डा के करीबी माने जाते हैं।
वो चार नये चेहरे जो असंतुष्ट खेमे से नए-नए जुड़े हैंः-
प्रिनीत कौर : पंजाब के पटियाला से प्रिनीत कौर कांग्रेस सांसद हैं। वे पंजाब के पूर्व ब्ड कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी हैं। ब्ड पद से हटाने के कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर पंजाब लोक पार्टी बना चुके हैं। 77 साल की कौर मनमोहन सरकार में मंत्री भी रह चुकी हैं, लेकिन 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में उन्हें पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए टिकट न मिले। क्योंकि वो विधानसभा चुनाव में भाजपा के बड़े नेताओं के साथ चुनाव प्रचार कर चुकी हैं।
शंकर सिंह वाघेला : 81 वर्षीय शंकर सिंह वाघेला काफी पहले कांग्रेस छोड़ चुके थे। तब उन्होंने छब्च् जॉइन की थी। हालांकि, तीन साल पहले 2019 में उन्होंने छब्च् छोड़ कर अपनी पार्टी बनाई। वाघेला पश्चिम बंगाल की ब्ड ममता बनर्जी के संपर्क में भी बताए जा रहे हैं। ऐसे में वाघेला का कांग्रेस के असंतुष्ट खेमे के नेताओं के साथ डिनर में शामिल होना चर्चा का विषय है।
मणिशंकर अय्यर : 81 वर्षीय मणिशंकर अय्यर अपने बयानों से कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचा चुके हैं। चाय वाला, नीच जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर उन्हें काफी ट्रोल किया गया था। कांग्रेस ने भी मजबूरी में उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। बाद में उनके निष्कासन को निरस्त कर दिया गया था। अब उनका सियासी प्रभाव ना के बराबर है।
एमए खान : तेलंगाना से आने वाले एमए खान दो बार राज्यसभा सांसद रहे। कांग्रेस की ओर से 2021 के आखिर में अनुशासन समिति बनाई गई थी, जिसमें खान को उपाध्यक्ष बनाया गया था। 74 वर्षीय खान अभी महत्वपूर्ण पद पर नहीं हैं।
जी-23 से आठ हुए अलग, जितिन पार्टी छोड़ चुके
अगस्त 2020 में बने जी– 23 में आठ नेता लगभग अलग हो चुके हैं। गुलाम नबी आजाद की डिनर पार्टी में ये नेता शामिल भी नहीं हुए। इसमें वीरप्पा मोइली, मिलिंद देवड़ा, रेणुका चौधरी, मुकुल वासनिक, योगानंद शास्त्री, अरविंदर सिंह लवली, कौल सिंह ठाकुर और अजय सिंह ने दूरी बना ली है, जबकि जितिन प्रसाद अब भाजपा में हैं।
सोनिया-आजाद, राहुल-हुड्डा की मुलाकात में क्या हुई चर्चा
होली के दिन सोनिया गांधी और गुलाम नबी आजाद और राहुल गांधी व हुड्डा के बीच मुलाकात हुई। सूचना बाहर आई कि सोनिया गांधी ही कांग्रेस की अध्यक्ष बनी रहेंगी। असंतुष्ट खेमे के नेता पार्टी को मजबूत करने का कार्य करेंगे, लेकिन सियासी चर्चा यह बाहर आ रही है कि गुलाम नबी आजाद को राज्यसभा में भेजने और पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा को पूरी तरह हरियाणा कांग्रेस की कमान देने पर सहमति बनी है, लेकिन यह कितना सच है, यह आने वाले दिनों में साफ हो पाएगा।


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