आत्मनिर्भर भारत के लिए किसानों का आत्मनिर्भर होना जरूरी- भाकियू

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

December 2022
M T W T F S S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031  
December 7, 2022

हर ख़बर पर हमारी पकड़

आत्मनिर्भर भारत के लिए किसानों का आत्मनिर्भर होना जरूरी- भाकियू

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/द्वारका/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/भावना शर्मा/- वितमंत्री निर्मला सीतारमण ने आज देश में मजदूरों व किसानों के लिए जिस आर्थिक पैकेज की घोषणा की है उसपर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चै राकेश टिकैत ने कहा कि किसानों के लिए घोषित आर्थिक पैकेज में कृषि ऋण को तीन माह के लिए आगे बढ़ाने एवं नए किसान क्रेडिट कार्ड से लोन दिए जाने के अलावा किसानों को सरकार ने आखिर नया क्या दिया है। किसानों के प्रति इस उपेक्षित व्यवहार को कतई बर्दाश्त नही किया जायेगा और इसके लिए भारतीय किसान यूनियन देशव्यापी आंदोलन का आगाज करेगी। उन्होने कहा कि सरकार की इस नई नीति से देश के किसान आत्मनिर्भरता की नही आत्महत्या की तरफ रूख करेगा।
                                      उन्होने कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और कृषि के दम पर ही भारत कभी सोने की चिड़िया कहलाता था लेकिन हमारे नीति निर्धारकों को यह बात समझ नही आयेगी। क्योंकि उनकी आंखों पर औद्योगिकिकरण का चश्मा चढ़ा हुआ है। हमारे नीति निर्धारकों को यह बात समझ लेनी चाहिए कि यदि हमारे  कृषि और कृषि आधारित उद्योगों के लिए अनुकूल माहौल होता तो आज किसानों को ऋण की आवश्यकता कहा थी। उल्टा किसान बैंकों से ऋण लेने की बजाये उन्हे देने में सक्षम होते लेकिन सरकारी उपेक्षा के चलते कृषि व कृषि कार्य पूरी तरह से गर्त में चले गये है जिसकारण बैंक भी किसानों को ऋण देने में इतना हिचक रहे हैं। बैंकों से पहले ही किसानों ने ऋण ले रखा है और इस परिस्थिति में नया ऋण लेकर कोई भी जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है। उन्होने कहा कि इसका कारण साफ है कि भारत एक गहरे आथिक संकट के जाल में फंसा है। यह आर्थिक संकट का जाल कोरोना की ही देन नहीं है, बल्कि कोरोना पूर्व का है। कोरोना संकट ने इसमें आग में घी का काम किया है। भारत में नोटबन्दी और जीएसटी से तबाह हुई अर्थव्यवस्था को मोदी सरकार द्वारा कुछ समय तक मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप, स्मार्ट सिटी, सांसद ग्राम, विदेशी निवेश, पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था जैसे जुमलों से ढकने की कोशिश की गई। पर पिछले वित्तीय वर्ष के तीसरी तिमाही के आंकड़े आने तक खुद मोदी सरकार मान चुकी थी कि हमारी विकास दर अब 4.5 प्रतिशत पर रहेगी।कृषि की विकास दर 2.7 पर सिमट चुकी है। जिसके आधार पर सरकार किसानों की आमंदनी दोगुनी करने का दम भरती है।  इससे बाजार में मांग का भारी अभाव पैदा हो गया। यानी देश में आम आदमी की क्रय शक्ति में भारी गिरावट आ चुकी थी।
                           तब तमाम अर्थशास्त्रियों, विपक्षी दलों, ट्रेड यूनियन से लेकर किसान संगठनों ने सरकार से मांग की थी कि देश में अगर लिक्विडिटी (तरलता) को बढ़ाना है तो आम लोगों के हाथ में पैसा देना होगा। इसमें मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी व न्यूनतम वेतन में बृद्धि, मनरेगा में 200 दिनों का काम और शहरी गरीबों के लिए भी मनरेगा जैसे स्कीम लाना, किसानों को उनकी उपज की लागत का डेढ़ गुना दाम और सरकारी खरीद की गारंटी, देश के हर किसान के लिए एक न्यूनतम आय की गारंटी स्कीम, किसानों के लिए सम्मान निधि की राशि को बढ़कर 24000 सालाना करना, किसानों का सभी तरह के ऋण माफ करना, फल, सब्जी, दूध, पोल्ट्रीफार्मर, मधुमक्खी पालन, मछली उत्पादक किसानों के नुकसान की भरपाई, जैसे उपाय किये जाने की मांग थी । पर मोदी सरकार बड़े कारपोरेट घरानों पर देश का धन और संसाधन लुटाती रही है।
                                    उन्होने कहा कि आज वित्त मन्त्री निर्मला सीतारमन की घोषणाओं में कहीं भी किसानों, मजदूरों की मांगों को स्थान मिलता नहीं दिखा। मार्च-अप्रैल के वेतन बिना ही भूख से लड़ते-मरते मजदूरों का बड़ा हिस्सा अपने गांवों की ओर लौट रहा है। केंद्र व राज्य सरकारों की पूर्ण उपेक्षा से इतनी अमानवीय तकलीफों को झेल कर जो मजदूर गांव लौटे हैं, उनका बड़ा हिस्सा सामाजिक आर्थिक सुरक्षा की गारंटी के बिना जल्दी वापसी नहीं करेगा। जिससे कई राज्यो की खेती प्रभावित होगी और बैंकों पर भी इसका असर पड़ेगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि कोरोना संकट ने बाजार में मांग का और भी बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। जीवन के लिए बहुत जरूरी वस्तुओं को छोड़ बाकी उत्पादों की मांग तब तक नहीं बढ़ेगी, जब तक देश के 80 करोड़ मजदूरों-गरीबों-किसानों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ जाती। ऐसे में  बैंक ऋण का झुनझुना स्थिति में सुधार नही लाया जा सकता। किसानों को सरकार से बड़ी निराशा मिली है। उन्होने कहा कि जिस आत्मनिर्भरता की बात सरकार कर रही है उसको खेती के बिना हासिल करना कठिन ही नही असंभव है। किसान बेमौसम मार पहले से ही झेल रहे है। और उपर से सरकार भी उन्हे मारने पर तुली है। जिसके चलते देश का किसान अपने को ठगा महसूस कर रहा है। किसानों की स्थिति पर उन्होने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि किसानों के नुकसान की भरपाई व ऋण माफी हेतु भारतीय किसान यूनियन जल्द ही रणनीति तय कर बड़े आंदोलन का आगाज करेगी।

About Post Author

Subscribe to get news in your inbox