हर्षि दयानंद की जयंती पर राष्ट्रीय संगोष्ठी, ‘वेदों की ओर लौटो’ का संदेश गूंजा

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February 13, 2026

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नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-   श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के योग विज्ञान विभाग एवं सांख्ययोग विभाग की ओर से महर्षि दयानंद सरस्वती की 201वीं जयंती के अवसर पर 12 फरवरी 2026 को एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन वाचस्पति सभागार में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने दीप प्रज्वलन के साथ किया। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद का जीवन वेद ज्ञान के प्रसार और मानव कल्याण को समर्पित था। “वेदों की ओर लौटो” का संदेश केवल वैदिक मंत्रों के उच्चारण तक सीमित नहीं, बल्कि उनके मर्म को जीवन में उतारने का आह्वान है।

समाज सुधार और वैदिक मूल्यों पर जोर
मुख्य अतिथि के रूप में दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर के प्रो. रामप्रकाश ने कहा कि महर्षि दयानंद एक दूरदर्शी चिंतक थे, जिन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों को चुनौती दी और नैतिक मूल्यों पर आधारित समाज की परिकल्पना प्रस्तुत की। विशिष्ट अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. भारत भूषण ने स्वामी दयानंद को महान शिक्षाविद और सामाजिक पुनर्जागरण का अग्रदूत बताया।

ब्रह्मचर्य, आत्मसंयम और राष्ट्र उत्थान
मुख्य वक्ता आचार्य योगेश (प्राचार्य, गुरुकुल महाविद्यालय, गौतम नगर) ने अपने संबोधन में कहा कि भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने के लिए वैदिक मार्ग, आत्मसंयम, ईश्वर में आस्था और दृढ़ पुरुषार्थ आवश्यक हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. मारकण्डेय नाथ तिवारी ने कहा कि महर्षि दयानंद ने आत्मोत्थान, राष्ट्राभिमान और ऋषि परंपरा के सम्मान के लिए व्यापक प्रयास किए।

कार्यक्रम संयोजक डॉ. रमेश कुमार ने ब्रह्मचर्य को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बताते हुए कहा कि आत्मानुशासन, इंद्रिय संयम और त्याग की भावना से ही समाज सशक्त बन सकता है। उन्होंने इसे आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति का मूल मंत्र बताया।

धन्यवाद ज्ञापन और उपस्थिति
संगोष्ठी के समापन पर डॉ. जयसिंह भढ़िया ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम में वैदिक चिंतन और राष्ट्र निर्माण के विषयों पर व्यापक विमर्श हुआ।

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