गुरुग्राम/- ब्रेन स्ट्रोक के इलाज से जुड़ी नई-नई तकनीक विकसित हो रही हैं, बावजूद इसके हर साल स्ट्रोक के मामलों में काफी इजाफा देखने को मिल रहा है। यहां तक कि यंग आबादी भी स्ट्रोक का शिकार हो रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए गुरुग्राम के आर्टेमिस अग्रिम इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइंसेज ने आज एक जन-जागरुकता कार्यक्रम का आयोजन किया। वर्ल्ड स्ट्रोक डे के मद्देनजर, इस सत्र का आयोजन किया गया है। सत्र में बताया गया कि स्ट्रोक के 70-80 फीसदी मामलों में इलाज मुमकिन है और मरीज को पूरी तरह सुरक्षित बचाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि समय पर मरीज को अस्पताल पहुंचा दिया जाए। इसके लिए ड्रिप एंड शिप फॉर्मूला मॉडल भी हरियाणा के अलग-अलग इलाकों में लागू किया गया है। जिसके तहत स्ट्रोक पड़ने के तुरंत बाद यानी गोल्डन आवर्स में मरीज को नजदीकी अस्पताल में प्राथमिक उपचार दिया जाता है। इस मॉडल को अब नेशनल लेवल पर बढ़ाने का भी प्लान है।
आजकल इलाज के नए मेथड्स इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इनमें से एक है मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी। ये प्रक्रिया बेहद असरदार रहती है। इमरजेंसी की हालत में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी सबसे ज्यादा कारगर साबित होती है और ये मिनिमली इनवेसिव होती है। इसमें स्ट्रोक पड़ने के बाद न सिर्फ मरीज को बचाया जा सकता है बल्कि स्ट्रोक के कारण होने वाली पैरालिसिस जैसी स्थिति से भी बचा जा सकता है। गुरुग्राम में आयोजित अवेयरनेस सेशन में अपने संबोधन में डॉ.विपुल गुप्ता में बताया कि लोगों के स्ट्रोक के लक्षणों की जानकारी फैलाना बेहद आवश्यक है ताकि इलाज के बेहतर रिजल्ट पाए जा सकें। स्ट्रोक के कई पेशंट्श का हाल ही में अग्रिम इंस्टिट्यूट में इलाज किया गया है, जहां डॉक्टरों ने अपनी कुशलता दिखाते हुए मरीजों को मौत के मुंह से निकालने का काम किया है।
डॉ. विपुल गुप्ता ने इस मौके पर कहा, ‘’हाल में 55 साल के एक मरीज हमारे यहां भर्ती हुए। उन्हें अचानक चक्कर आने लगते थे और वो अपनी सुध भी खोने लगे थे, ऐसा घंटों तक होता था। इसके साथ ही पेशंट को शरीर के दाहिने हिस्से में कमजोरी की भी शिकायत थी। यहां तक कि वो ठीक से बोल पाने में भी सक्षम नहीं थे। मरीज की जांच पड़ताल की गई, ब्रेन एंजियो से पता चला कि उन्हें आर्टरी-वीनस मालफॉर्मेशन (एवीएम) की शिकायत है, जो ब्रेन हैमरेज की तरफ ले जाती है। साथ ही इससे दिमाग की नसों पर भी दबाव बढ़ जाता है और वो ठीक से काम नहीं कर पाता है। मरीज को तत्काल इलाज की जरूरत थी। वीनस प्रेशर को घटाने और ब्रेन के फ्लो को ठीक करने के लिए एम्बोलाइजेशन किया गया। ये प्रक्रिया मिनिमली इनवेसिव थी। किस्मत से ये प्रयास सफल रहा और मरीज ठोक हो गए, उनकी बोलने की क्षमता भी वापस आ गई। आज इस सत्र के माध्यम से मैं लोगों को बताना चाहता हूं कि भले ही इलाज के लिए नई-नई तकनीक आ गई हो, लेकिन जागरुकता भी बहुत जरूरी है। ताकि समय पर मरीज को इलाज के लिए भेजा जा सके और उन्हें ठीक किया जा सके।’’
60 साल की एक महिला को भी इस तरह की शिकायत थी। वो शरीर के बाएं हिस्से में कमजोरी महसूस कर रही थीं. उनके चेकअप्स किए गए तो ब्रेन की बेसिलर आर्टरी में क्लॉट का पता चला. वो इसकी दवाई भी खा रही थीं, लेकिन असर नहीं हुआ और वो लगभग पैरालाइज हो गईं। डॉ.विपुल गुप्ता और उनकी टीम ने महिला मरीज की मैकेनिकल थ्रोम्बैक्टोमी की और क्लॉट को हटाया। जल्द ही मरीज ने रिकवरी कर ली और कुछ दिन बाद उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। स्ट्रोक की स्थिति में समय बहुत कीमती है। हर मिनट की देरी से मरीज की हालत बिगड़ती जाती है। एक मिनट की देरी पर पेशंट के ब्रेन में लगभग 1.9 मिलियन न्यूरॉन्स डैमेज हो जाते हैं। स्ट्रोक पड़ने के 6-8 घंटे बाद का समय गोल्ड पीरियड कहलाता है। इस पीरियड में दिमाग की ब्लॉक नसों को खोला जा सकता है और ब्लड के फ्लो को रिस्टोर किया जा सकता है। ये या तो टीपीए के जरिए किया जाता है या फिर मैकेनिकल थ्रोम्बैक्टोमी की न्यूरो इंटर्वेंशन प्रक्रिया के तहत किया जाता है।
डॉ.राज श्रीनिवासन पर्थसारथी ने कहा, ’’जैसा कि पहले बताया गया है, स्ट्रोक का इलाज संभव है और यह भी रोका जा सकता है। हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी चीजों को छोड़ दें, तो तनाव, धूम्रपान, शराब, शारीरिक निष्क्रियता, खराब खान-पान जैसी आदतों को ठीक कर स्ट्रोक को रोकने में मदद मिल सकती है। रोजमर्रा के जीवन में बदलाव और बुरी आदतों को अपनाने से स्ट्रोक की समस्या बढ़ रही है। फिजिकल एक्सरसाइज में कमी, स्मोकिंग, शराब का अधिक सेवन जैसी आदतें तो देश की युवा आबादी को भी स्ट्रोक की तरफ धकेल रही है। भागदौड़ भरी इस लाइफ में टेक्नोलॉजी ने हमारा तो जीवन आसान बना दिया है लेकिन शारीरिक मेहनत या फिजिकल एक्टिविटी को घटा दिया है। इसके अलावा ज्यादा स्ट्रेस, डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी समस्याएं भी यंग जनरेशन को लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों की चपेट में ला रही हैं। लिहाजा, जरूरी है कि फिजिकल एक्सरसाइज को आदत में शुमार किया जाए, इससे न सिर्फ आप सेहतमंद रह सकते हैं, बल्कि बीमारियों को भी खुद से दूर रखने में कामयाबी पा सकते हैं। डॉ. विपुल गुप्ता का कहना है कि इन रिस्क फैक्टर्स पर काबू कर स्ट्रोक के खतरे को 70 फीसदी तक कम किया जा सकता है। ब्रेन स्ट्रोक के कई तरह के लक्षण होते हैं जिन्हें समझने और पहचानने की जरूरत है। आंखों की रोशनी में दिक्कत, हाथों में कमजोरी, चेहरा हल्का पड़ना, बोलने में दिक्कत. टाइम पर एम्बुलेंस बुलाना भी बेहद अहम कारक है। ये लक्षण पहचानकर जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखाने की आवश्यकता है। सही इलाज में हर मिनट की देरी दिमाग को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। लोगों के बीच स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानकर तुरंत इलाज करना बेहद आवश्यक है। क्योंकि एक मिनट की देरी से दिमाग के 20 लाख सेल्स डैमेज हो सकते हैं। स्ट्रोक के 6 घंटे के अंदर अस्पताल पहुंचना गोल्डन विंडो समय माना जाता है।


More Stories
अमरावती में विशाल किन्नर-संत सम्मेलन, गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने की उठी मांग
सामाजिक समरसता पर आरजेएस का विशेष आयोजन-सत्य
जोगी परिवार को न्यायपालिका पर भरोसा, बोले— सच की जीत तय
मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत को राहत: अर्जेंटीना बना नया ऊर्जा सहारा
बड़ा कदम: NGRMP परियोजना के लिए ₹9 करोड़ की स्वीकृति
देहरादून में क्रिकेट टूर्नामेंट का आगाज़, मुख्यमंत्री धामी ने किया शुभारंभ