संत शिरोमणि रविदास का जीवन देता है दया, प्रेम, क्षमा, धैर्य, सौहार्द, समानता की प्रेरणा : हुजूर कँवर साहेब जी

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

September 2026
MTWTFSS
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930 
September 24, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

संत शिरोमणि रविदास का जीवन देता है दया, प्रेम, क्षमा, धैर्य, सौहार्द, समानता की प्रेरणा : हुजूर कँवर साहेब जी

-संत रविदास की जयंती पर सत्संग में पंहुचे हजारों श्रद्धालु,

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/चरखी दादरी/जयवीर फोगाट/शिव कुमार यादव/- जब सन्त सतगुरु महात्मा इस धरा पर आते हैं तो तीन ताप से दुखी जीवो को बड़ी शांति मिलती है। इन्ही सन्त महापुरुषों में एक थे सन्त शिरोमणि रविदास जी जिनका आज संसार अवतरण दिवस मना रहा है। संत शिरोमणि रविदास का जीवन दया, प्रेम, क्षमा, धैर्य, सौहार्द, समानता की प्रेरणा देता है। सन्त कभी इस जगत से जाते नहीं है वे तो अमर हैं क्योंकि उनके द्वारा दिया सन्देश और उपदेश सदैव मनावता की भलाई का कार्य करते हैं।

हुजूर कंवर साहेब जी ने फरमाया कि भक्ति काल के दौरान एक समय ऐसा आया था जब विदेशी ताकत हिंदुस्तान पर राज कर रही थी। हिंदुस्तान के आदि धर्म की जगह दूसरी मान्यताओं का जोर था जिसके कारण अनेकों आडम्बर फेल गए थे। उन आडंबरों और पाखंडों को नेस्तनाबूद करने के लिए अनेको संतो ने अपना अमूल्य योगदान दिया। इन्ही संतो में संत शिरोमणी रविदास जी नाम अग्रणी तौर पर लिया जाता है। गुरु महाराज जी ने कहा कि जाति पाती का मोल नहीं होता, मोल तो ज्ञान का होता है जैसे महता तलवार की होती है ना कि म्यान की। उन्होंने कहा कि ये दुनियादारी ऐसी है की आप अच्छा काम करना शुरू कर दो आपको कई टोकने वाले मिल जायेंगे। जगत और भगत का तो बैर बहुत पुराना है। यही रविदास जी और कबीर साहब के साथ हुआ था यही राधास्वामी सत्संग दिनोद के अधिष्ठाता परमसंत ताराचंद जी महाराज के साथ भी हुआ था लेकिन भक्ति ऐसा प्रकाश है जो पाताल में भी प्रकट होगा तो उसकी चमक आकाश में दिखती है। ताराचंद जी को भी उनके पिता ने भक्ति के रास्ते पर जाने से अनेकों बार रोका लेकिन भक्ति की धारा कभी नहीं रुकती। उनके पिता ने जब एक बार उनसे कहा कि अगर अब तू साधुओं के पास गया तो मैं तुझे दीन दुनी से खो दूंगा तो ताराचंद जी ने हंस कर कहा कि दीन दुनी से खोने के लिए तो मैं जगह जगह भटक रहा हूं अगर आप ही खो दोगे तो मुझे भटकने की क्या जरूरत। हुजूर महाराज जी ने फरमाया कि अंग्रेजी में एक कहावत बड़ी प्रख्यात है कि ज्तनजी मिंते दव मÛंउपदंजपवद यानी सत्य किसी परीक्षा से नहीं घबराता। उन्होंने कहा कि कर्मों का लेखा युग दर युग चलता है इन्हे कोई काट सकता है तो पूर्ण संत ही काटता है।

हुजूर महाराज जी ने संत रविदास जी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि रविदास जी ऐसे समय में पैदा हुए थे जब जाति पाती का बोलबाला था हालांकि संतो की कोई जाति नहीं होती। संत महात्माओं का सत जीवन हमें यही शिक्षा देता है कि भक्ति के लिए जाति पाती, ऊंच नीच की आवश्यकता नहीं है बल्कि भक्ति के लिए तो अच्छे कर्मों की आवश्यकता है। ये तो संतो की ही मौज है है कि वो समाज को सही दिशा देने के लिए कौन सी जाति, कौन सी जगह को चुनते हैं। संत तो सभी एक ही घर से आते हैं और एक ही उद्देश्य लेकर आते हैं। सन्त रविदास जी के जीवन में अनेको परेशानियां इस जगत ने दी लेकिन सन्त इन परेशानियों से घबराते नहीं है अपितु वे तो इसे भी परमात्मा की रजा मान कर स्वीकार करते हैं। रविदास जी जाती पाति को नहीं कर्मो को प्रधान मानते थे। वे तो कहते भी है कि जैसे तलवार का मोल होता है ना कि उसकी म्यान का वैसे ही शरीर का, जाती का धर्म का महत्व नहीं है महत्व तो ज्ञान का है। हुजूर महाराज जी ने कहा कि जिसके कर्म अच्छे हैं वो नीचे कुल में जन्म लेकर भी धर्मात्मा है पर जिसके कर्म गंदे हैं वो उच्चे कुल में जन्म लेकर भी अधर्मी ही होता है।

गुरु महाराज जी ने कहा कि प्रसंग प्रसिद्ध है कि अपने पहले जन्म में सन्त रविदास जी की किसी बात से नाराज होकर रामानन्द जी ने उन्हें श्राप दिया। अगले जन्म में जब रविदास जी ने जन्म लिया तो उन्होंने कई दिनों तक मां का दूध नही पिया। जब रामानंद जी ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि अब तेरा कर्म कट गया है दूध पी ले। तब रामानन्द जी ने दूध का पान किया और इस जन्म में भी उन्होंने रामानन्द जी को ही अपना गुरु बनाया। गुरु जी ने कहा कि जैसे बिना हथियार के सुरमा नही लड़ सकता वैसे ही बिना इष्ट के व बिना गुरु के भक्ति नही की जा सकती। उन्होंने फ़रमाया कि रविदास जी ने इस मिथक को भी तोड़ा कि पूजा पाठ करना, दान दक्षिणा लेना केवल ब्राह्मण का काम है। गुरु जी ने कहा कि ज्ञान का अधिकार सबका है। उन्होंने कहा कि कबीर साहब भी अपनी एक वाणी में यही दशा बयान करते है कि एक बार मुख से राम बिसारा था जो जुलाहा जाति में जन्म हुआ। उन्होंने कहा कि जिसका कर्म अच्छा नही है उसको जगत में भी कष्ट होता है और अगत में भी।

हुजूर कंवर साहेब जी ने कहा कि संत रविदास जी की भक्ति की दीप्ति इतनी तेज थी कि उन्होंने तो अपनी कठौती में ही गंगा को हाजिर कर लिया था। गुरु महाराज जी ने कहा कि इंसान का जन्म बहुत मुश्किल से मिलता है क्योंकि ये जीव चार खान का मुसाफिर है क्या पता हमारा अगला जन्म कैसा हो इसलिए इस दुर्लभ यौनी का फायदा उठाओ। अपने कर्मो को सुधारो, अपने जीवन में दया प्रेम परोपकार और परमार्थ को स्थान दो। जब मन की शैतानियों से पार पा जाओगे तो ही रविदास जी के जीवन से प्रेरणा पा कर अपने जीवन को सफल बना पाओगे। उन्होंने कहा की सत्संग में चार बातो पर ध्यान दो पहला मन को स्थिर और एकाग्रचित होकर बैठो, दूसरा हृदय को खुला छोड़ कर बैठो ताकि सत्संग का संदेश भली भांति उसमें प्रवेश कर सके। तीसरा अपने नेत्रों को सतगुरु के मुख से मत हटने दो और चौथा जो वचन सुनो उस पर अमल कमाओ। गुरु महाराज जी ने कहा कि तीन तरीके से कल्याण संभव है। मन पवित्र होगा प्रभु का नाम जपने से, तन पवित्र होगा सेवा करने से और धन पवित्र होगा दान करने से।

About Post Author

Subscribe to get news in your inbox