भक्त शिरोमणि रामदूत हनुमान”

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

April 2026
M T W T F S S
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
27282930  
April 1, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

राम नाम के अनन्य प्रेमी भक्त शिरोमणि अंजनीसुत हनुमानजी की महिमा से भला कौन परिचित नहीं है। रामायण की कल्पना रामदूत हनुमान के बिना नहीं की जा सकती। भक्त और भक्ति की उत्कृष्टता को सिद्ध करने वाले हनुमानजी की लीला न्यारी है। श्रीराम दूत हनुमान भक्ति की उच्च पराकाष्ठा को सिद्ध करते है इसी कारण श्रीराम भी सदैव उनके साथ ही अपनी पूर्णता को प्रदर्शित करते है, इसीलिए उन्हें भक्त शिरोमणि की भी संज्ञा दी गई है। रामायण में हनुमानजी का नहीं श्रीराम दूत के नवीन रूप का अवतरण हुआ, जो हमें यह सिखाता है कि हम अपनी सेवा, भक्ति, कर्मों एवं प्रयासों से नवीन स्वरूप में संसार के समक्ष प्रत्यक्ष हो सकते है। महादेव के अंश रुद्रावतार ने श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति एवं प्रेम को हृदय में विराजमान किया। महादेव को भोलेनाथ कहा जाता है, यही गुण उनके रुद्रावतार हनुमानजी के स्वभाव में परिलक्षित होता है। वे भी प्रभु श्रीराम की प्रसन्नता के लिए पूरे शरीर पर सिंदूर धारण करते है।

जहाँ धन, पद और यश के लालच में व्यक्ति अपना सुख चैन, सर्वस्व त्याग देता है, वहीं हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम के आग्रह पर उनके चरणपद ही माँग लिए और बाकी सबका सहज ही त्याग कर दिया। हनुमानजी की अनूठी विशेषता उनका अहंकार शून्य होना भी है। हनुमानजी की प्रतिभा संपन्नता तो हमें बाल्य रूप से ही दिखाई देने लगती है। भूख लगने पर सूर्य को फल समझकर खा लेना, उनकी अद्भुत शक्ति संपन्नता को प्रदर्शित करता है, परंतु अपने सम्बोधन में वे रामदूत के उच्चारण को ही प्राथमिकता देते है। हनुमानजी में यदि सेवा भाव एवं पूर्ण समर्पण था, तो वहीं श्रीराम भी हनुमान के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखते थे। ज्ञानियों में अग्रगण्य हनुमानजी की एक और विलक्षण विशेषता यह है कि वे अपना परिचय सदैव श्रीराम के दूत के रूप में देते है।

हनुमानजी इतने बुद्धिमान है कि उन्हें ज्ञात है कि कब उन्हें लघु रूप धारण करना है और कब वृहद रूप धारण करके श्रीराम के कार्यो को शीघ्रता से सम्पन्न करना है। हमें सदैव अपने कार्य के प्रति उत्साह का भाव दिखाना चाहिए। जब श्रीराम के कार्य को पूरा करने के लिए हनुमान समुद्र पार करने गए तो वे अत्यंत उत्साहित थे और लक्ष्य के प्रति दृढ़निष्ठ थे। जब मैनाक पर्वत ने उन्हें रुकने को कहा तो उन्होने कहा मुझे शीघ्रता से माता सीता का पता लगाना है और तत्परता से श्रीराम का कार्य करना है। कार्यों को प्राथमिकता देना भी हमें हनुमानजी से सीखना चाहिए।    

श्रीराम दूत हनुमान के जीवन में भक्ति और शक्ति का अनूठा समन्वय दृष्टिगोचर होता है। रामायण का प्रत्येक चरित्र अद्भुत है, परंतु रामायण के प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य को पूर्णता हनुमानजी ने दी। समुद्र लाँघना हो, माता सीता का पता लगाना हो, लंका दहन करना हो या लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा करनी हो, यह सभी कार्य हनुमानजी के द्वारा पूर्णता को प्राप्त हुए; फिर भी वे प्रत्येक कार्य की सफलता का श्रेय श्रीराम को देते है। हनुमानजी के गुण स्वरूप कार्यों एवं आदर्शों के अनुरूप ही उनके बारह नाम है, जो मनुष्य को अदम्य साहस और ऊर्जा प्रदान करते है। हनुमान, अंजनीसुत, वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ठ, फाल्गुनसखा, पिङ्गाक्ष, अमितविक्रम, सीताशोकविनाशन, लक्ष्मण प्राणदाता, दशग्रीवदर्पहा इन सभी नामों को स्मरण करने से जीवन के पाप और संताप नष्ट होते है। कलयुग में हनुमान चालीसा और सुंदरकाण्ड तो हनुमानजी की कृपा प्राप्ति के लिए भक्तो के अमोघ शस्त्र है। हनुमान चालीसा की उत्कृष्टता तो इस बात में निहित है कि स्वयं गौरी के ईश महादेव उसके साक्षी बनते है। हनुमान चालीसा भी हममे अदम्य शक्ति, साहस, भक्ति एवं ऊर्जा का अंकुरण करती है।

श्रीरामकथा श्रवण के प्रेमी हनुमानजी सदैव श्रीराम के नाम स्वरूप एवं गुणों का दर्शन करते है। यदि हम जीवन के उपवन में भक्ति एवं प्रसन्नता के प्रसून को पल्लवित और पुष्पित करना चाहते है तो असाध्य कार्य को भी साध्य करने वाले रामभक्त हनुमान की शरण ग्रहण कर लेना चाहिए। अद्वितीय भक्ति की प्रतीक माता सीता ने उन्हें अष्ट सिद्धि और नव निधि का आशीष दिया है। हनुमानजी की विलक्षण लीला हमें शिक्षा देती है कि व्यक्ति के जीवन में कर्म ही प्रधान होते है। उन्हीं कर्मो की वजह से हनुमानजी श्रीराम को भरत एवं लक्ष्मण के समान प्रिय हुए। हनुमानजी की आत्मा की सुंदरता तो माता जानकी और श्रीराम के उनके हृदय में विराजमान होने से है।

भक्त शिरोमणि हनुमान भगवान और भक्ति सब कुछ प्रदान करने का सामर्थ्य रखते है। संसार के प्रत्येक दुर्गम कार्य को सुगमता से करने की क्षमता हनुमानजी में है। श्रीराम दूत के सम्बोधन से तो वे अति प्रसन्न हो जाते है और भक्त पर अपनी विशेष कृपा करते है। स्वयं उत्तम चरित्र से शोभायमान हनुमानजी हमेशा श्रीराम के चरित्र को सुनने के लिए लालायित रहते है। समस्त सद्गुणों के स्वामी हनुमानजी संकट मोचक है।

हनुमान जन्मोत्सव जैसे उत्सव हममे भक्ति की अनूठी ऊर्जा का संचार करते है। अक्सर सांसरिक मोहमाया से भगवान की स्मृति खो देते है, परंतु प्रत्येक उत्सव हममे भगवान की स्मृति को जीवंत करता है। महाभारत में जब कुंती ने श्रीकृष्ण से दु:ख मांगा तब श्रीक़ृष्ण ने कहा की आपका पूरा जीवन अथक संघर्षों में व्यतीत हुआ इसके पश्चात भी आप दु:ख माँग रही है। तब उन्होने गोविंद को उत्तर दिया की दु:ख में सदैव आपकी स्मृति बनी रहती है। इसी प्रकार यह छोटे-छोटे उत्सव हमें भगवान के नाम रूपी बैंक में निवेश करने को प्रेरित करते है, जोकि मनुष्ययोनि की सच्ची कमाई है। तो आइये उन्हीं श्रेष्ठ भक्त शिरोमणि हनुमानजी के जन्मोत्सव को पूर्ण हर्षो-उल्लास से मनाए। भक्ति में भाव की प्रधानता होती है। प्रभु कभी भी पूजा के मापदंड एवं भक्ति के क्रियाकलाप नहीं देखते। राम कीर्तन भी हनुमानजी को अत्यंत प्रिय है। चारों युग में अपनी कीर्ति को प्रतिष्ठित करने वाले हनुमानजी कलयुग में राम कथा होने पर यत्र-तत्र विराजमान होते है, तो हम श्रीराम नाम के उद्घोष के साथ सहज ही राम भक्त हनुमान की कृपा को प्राप्त कर सकते है।    

डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)

About Post Author

आपने शायद इसे नहीं पढ़ा

Subscribe to get news in your inbox