दिल्ली/- दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में 14 दिसंबर को एक 17 साल की लड़की पर तेजाब फेंकें जाने के मामले ने एक बार फिर बच्चियों के खिलाफ होने वाली हैवानियत को उजागर कर दिया है। हालांकि यह एक अकेली घटना नही है जो लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों को उजागर कर रही है बल्कि देश में रोजाना कहीं न कहीं ऐसे मामले घट रहे है। लेकिन फिर भी सरकार व पुलिस प्रशासन ऐसा कोई कदम नही उठा रहा है जिससे इन घटनाओं पर रोक लग सके। सिर्फ दो दिन हो-हल्ला मचाने के बाद सब बंद हो जाता है और बच्चियों व महिलाओं की सुरक्षा में बनने वाली योजनाऐं फिर ठहर जाती है या यूं कहे कि नई घटना के घटित होने का इंतजार करती हैं। इस तरह की घटनाऐं एक बार नही कई बार निर्भया फंड को आईना दिखा चुकी है। जिसका इस्तेमाल महिलाओं की सुरक्षा की बजाये कहीं और ही हो रहा है। फिर भी सरकार कोई संज्ञान नही ले रही है।
निर्भया फंड के नोडल अथॉरिटी महिला और बाल विकास मंत्रालय ने आवंटित बजट का महज 20 प्रतिशत ही इस्तेमाल किया। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि क्या इन पैसों से महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध से निपटा जा सकेगा या महिलाओं को सुरक्षा दी जा सकेगी।
दिल्ली की सोशल एक्टिविस्ट योगिता भयाना कहती हैं कि 16 दिसंबर 2012 को हुए निर्भया मामले के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्भया फंड बनाया गया। लेकिन हकीकत यह है कि या तो इस फंड का इस्तेमाल नहीं हो रहा या फिर इसका खुलेआम दुरुपयोग किया जाता है। इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और फंड की मॉनिटरिंग का न होना भी है।
जेंडर इनइक्विलिटी और महिला हिंसा से जुड़े मुद्दों पर काम कर रही संस्था ऑक्सफैम ने 2020-21 में निर्भया फंड पर एक रिपोर्ट तैयार की। रिपोर्ट के मुताबिक, निर्भया फंड के तहत केंद्र सरकार की ओर से 6212 करोड़ रुपए दिए गए। इनमें से दो तिहाई यानी 4,212 करोड़ रुपए मंत्रालय और विभागों को दे दिए गए। निर्भया फंड का 73 फीसदी गृह मंत्रालय को भेजा गया। जितनी राशि निर्भया फंड से दी गई वह देश की किसी एक महिला या लड़की की सुरक्षा के लिए महज 30 रुपए ही बैठती है।
इसी तरह एक और खबर है कि महाराष्ट्र में सीएम एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के विधायकों की सुरक्षा के लिए निर्भया फंड का दुरुपयोग किया गया।
महाराष्ट्र सरकार को निर्भया फंड के तहत 30 करोड़ मिले थे। इन पैसों से 220 बोलेरो, 35 अर्टिगा, 313 पल्सर बाइक और 200 स्कूटी खरीदी गईं। इनमें से 47 बोलेरो का इस्तेमाल विधायकों की वाई$ सुरक्षा के लिए किया गया। लड़कियों की सुरक्षा का सवाल ज्यों का त्यों बरकरार है।
निर्भया फंड का इस्तेमाल कहां किया जा रहा है? क्या किसी रेप विक्टिम को इसका लाभ मिल पाता है? अगर विक्टिम को राहत नहीं दी जा रही तो फिर इस फंड का क्या औचित्य है और इसे कहां खर्च करना चाहिए, इसे ग्रैफिक से समझते हैं।
निर्भया की मां बोलीं-रेप विक्टिम को निर्भया फंड से नहीं मिलती कोई मदद
इस संबंध में निर्भया की मां आशा देवी का कहना है कि रेप पीड़िताओं को निर्भया फंड से किसी तरह की मदद नहीं मिलती। वो सवाल उठाती हैं कि क्या सड़कों पर स्ट्रीट लाइट और सीसीटीवी लगाने से रेप या एसिड पीड़िता की मदद हो सकेगी? निर्भया कांड के बाद यह फंड बनाया गया ताकि पीड़ितों की मदद हो सके। लेकिन हकीकत यही है कि सड़क पर सीसीटीवी और लाइट लगाने के नाम पर पैसे रोड कंस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट को भेज दिए जाते हैं।
आशा देवी कहती हैं मैं दिल्ली में पिछले 10 वर्षों से संघर्ष कर रही हूं, पर हालात में कोई बदलाव नहीं आया है। यदि कोई रेप विक्टिम है तो उसका नाम एलपीजी गैस लाभार्थियों में डाल दिया जाता है और इस तरह निर्भया फंड का पैसा पेट्रोलियम मंत्रालय को चला जाता है। पीड़िता को कृषि से जुड़े किसी स्कीम में लाभार्थी बनाया गया है तो फिर निर्भया फंड का पैसा कृषि मंत्रालय को चला जाता है।
निर्भया हादसे के बाद तय हुआ था कि फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे, अलग सुनवाई होगी, महिलाओं के लिए अलग थाने होंगे, पर ये सब नहीं हुआ। अब तो स्थिति यह है कि महिलाएं थाना जाने से डरती हैं।
निर्भया मामले के बाद आशा देवी ने निर्भया ज्योति ट्रस्ट बनाया। इस ट्रस्ट के जरिए वो पीड़ितों की मदद करती हैं। आशा देवी कहती हैं कि निर्भया फंड से कभी कोई पैसा नहीं मिला। मैंने सरकार को पत्र लिखा कि मैं अपनी संस्था के जरिए रेप विक्टिम की मदद करना चाहती हूं, पुनर्वास से लेकर रोजगार दिलाने तक मुझे फंड उपलब्ध कराइए, लेकिन इस पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। पीड़िताओं के लिए वकील की व्यवस्था करने और उसके लिए फंड देने की बात कही, तो भी दरकिनार कर दिया गया। वह कहती हैं कि जो सरवाइवर हैं या जो पीड़ित हैं उन्हें पैरों पर खड़ा करने के लिए रोजगार की व्यवस्था हो, जिससे वो जीने के लिए हौसला पा सकें।
वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान निर्भया फंड के लिए सरकार की ओर से 6,212.85 करोड़ रुपए दिए गए, लेकिन इनमें से 4,212.91 करोड़ ही संबंधित मंत्रालयों और विभागों को बांटे गए थे। जबकि केवल 46 प्रतिशत यानी 2,871.42 करोड़ रुपए का ही इस्तेमाल किया जा सका। एक नजर उन राज्यों के निर्भया फंड पर जहां महिलाओं के खिलाफ अपराध के सबसे अधिक मामले हैं।

फंड का इस्तेमाल कम, महिलाओं के खिलाफ अपराध ज्यादा
योगिता भयाना कहती हैं कि निर्भया फंड के जो पैसे दिए गए वो उन राज्यों में भी खर्च नहीं किए गए जहां महिलाओं के खिलाफ अपराध के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए। उत्तर प्रदेश में इस फंड से मिले 94 प्रतिशत से अधिक पैसों का इस्तेमाल ही नहीं किया गया।
दिल्ली जहां निर्भया मामला हुआ वहां भी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर लापरवाही बरती जा रही है। निर्भया फंड से मिले 84 प्रतिशत पैसों का इस्तेमाल ही नहीं किया गया। यह खुद सरकार की अपनी रिपोर्ट कहती है।
योगिता कहती हैं कि निर्भया फंड के पैसों का सही इस्तेमाल तभी होगा, जब मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जाए। कोई भी राज्य सरकार हो पैसों की कमी का रोना नहीं रो सकती। दिल्ली का उदाहरण लें। यहां अवेयरनेस फैलाने को लेकर सरकार ने कुछ नहीं किया। यही कारण है कि दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध में कमी नहीं आ रही। हकीकत यह है कि जो पैसे खर्च भी हो रहे वो अधिकारी अपने निजी खर्च के लिए इस्तेमाल किए जा रहे।
बस नाम के रह गए हैं वन स्टॉप सेंटर
निर्भया मामले के तीन साल बाद 2015 में केंद्र सरकार ने ‘वन स्टॉप सेंटर’ स्कीम की शुरुआत की थी। इसका मकसद पीड़ित महिलाओं को सपोर्ट देना था। इसलिए प्राइवेट और पब्लिक स्पेस में ‘वन स्टॉप सेंटर’ खोला गया जहां पीड़ितों को मेडिकल के साथ लीगल हेल्प, काउंसिलिंग, साइकोलॉजिकल सपोर्ट और टेंपेररी शेल्टर देना था।
संसद में 15 दिसंबर 2021 को केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बताया था कि अब तक 733 वन स्टॉप सेंटर को मंजूरी मिली है जिसमें 704 काम कर रहे हैं। सितंबर 2021 तक 4.50 लाख महिलाओं की सहायता की गई। इस स्कीम के लिए पैसे भी निर्भया फंड से ही दिए गए।
क्या वन स्टॉप सेंटर से वाकई पीड़ित महिलाओं की सहायता हो रही है?
योगिता भयाना कहती हैं कि दिल्ली जैसे शहरों में तो कुछ वन स्टॉप सेंटर मिल भी जाएंगे लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में तो खोजने से भी नहीं मिलता। जो वन स्टॉप सेंटर हैं उनकी कोई अलग से बिल्डिंग नहीं है। उन्हें अस्पतालों में ही खोला गया है। वहां भी उन्हें थोड़ा-बहुत इलाज के सिवा कुछ नहीं मिलता। पीड़िताओं को न तो कोई कानूनी सहायता मिलती है और न ही उनकी कोई काउंसिलिंग होती है।
पश्चिम बंगाल को छोड़कर देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वन स्टॉप सेंटर खोले गए हैं। उन राज्यों को देखते हैं जहां 30 से अधिक वन स्टॉप सेंटर चल रहे हैं।
शेल्टर होम्स बनें हॉरर होम्स
महाराष्ट्र के नासिक में शेल्टर होम की छह नाबालिग लड़कियों से रेप किया गया। पुलिस ने 28 नवंबर 2022 को छह अलग-अलग एफआईआर दर्ज की, जिसमें बताया गया कि शेल्टर होम का डायरेक्टर हर्शल मोरे बच्चियों के साथ गंदा काम करता था।
नासिक में इस तरह का दूसरा मामला सामने आया है। इससे पहले 2013 में नासिक के ही एक शेल्टर होम की 35 लड़कियों के साथ यौन शोषण की घटना हुई थी। इसमें न केवल शेल्टर होम का सुपरिटेंडेंट, केयर टेकर और सिक्योरिटी गार्ड शामिल था, बल्कि ट्रस्ट का चेयरमैन भी बच्चियों से गलत हरकत करता था।
चलते-चलते 2012 में हुई एक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। हमने उसे निर्भया कहा। फिर लड़कियों को निर्भय बनाने के लिए नए कानून बनाए, निर्भया फंड बनाया। लेकिन आज भी महिलाओं के खिलाफ अपराध कम होने के नाम नहीं ले रहे। देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराध का ग्राफ बढ़ा है। ऐसे में क्या लड़कियों की सुरक्षा को लेकर निश्चिंत हुआ जा सकता है? अगर सरकार इच्छाशक्ति दिखाए, सुरक्षा के सही कदम उठाए जाएं, मॉनिटरिंग की चेन बने तो महिलाओं की सुरक्षा हो सकेगी।


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