दिवाली पर ध्यान से करें चांदी के सिक्कों की खरीददारी, बाजार में नकली सिक्कों की भरमार

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दिवाली पर ध्यान से करें चांदी के सिक्कों की खरीददारी, बाजार में नकली सिक्कों की भरमार

-एक सिक्का बनाने की लागत 18 रुपए; फर्जी सर्टिफिकेट भी हैं देते

नई दिल्ली/- दिवाली पर महालक्ष्मी पूजा के लिए चांदी के सिक्के खरीदने जा रहे हैं तो सावधान हो जाएं। कहीं आप भी 650 रुपए देकर 18 रुपए वाला चांदी का खोटा सिक्का तो नहीं खरीद रहे। दरअसल बाजार में असली सिक्कों की तरह दिखने वाले नकली सिक्कों की भरमार बनी हुई है। इतना ही नही नकली सिक्कों को असली दिखाने के लिए फर्जी सर्टिफिकेट भी दिये जा रहे हैं।
             नकली सिक्के तैयार करने वाले महज 400 रुपए किलो वाली गिलट धातु और एक हजार रुपए किलो वाले जर्मन सिल्वर से इन्हें फैक्ट्रियों में तैयार कर मार्केट में बेच रहे है, लेकिन कीमत 55 हजार रुपए किलो वाली चांदी की वसूली जा रही है।


             चांदी में मिलावट कर नकली सिक्के बनाने और बेचने का ये खेल राजस्थान के जयपुर, अजमेर, कोटा और जोधपुर जैसे बड़े शहरों में धड़ल्ले से हो रहा है। कई सीक्रेट फैक्ट्रियों में सिक्के ढालने की बड़ी-बड़ी मशीनों पर दिन-रात सैकड़ों किलो नकली चांदी के सिक्के ऑर्डर पर तैयार हो रहे हैं। यहां से बने सिक्के ज्वेलरी शोरूम और छोटे व्यापारियों के जरिए आपके घर में पूजा की थाली तक पहुंच रहे हैं।
             जयपुर में हुए एक स्टिंग ने इस सारे मामले की सच्चाई सबके सामने ला दी है। किस तरह से लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए जालसाजों ने सभी प्रबंध किये हुए हैं। यहां तक सिक्कों की जांच व हॉलमार्क के निशान के साथ-साथ नकली सर्टिफिकेट भी देने का इंतजाम कर रखा है। राजस्थान में इन सिक्कों को ज्यादातर कस्बाई व ग्रामीण ईलाकों में बेचा जाता है।

दो तरह से होती है मिलावट
पहली :
सिल्वर में 30 से 40 फीसदी तक गिलट या जर्मन सिल्वर मिक्स कर सिक्के तैयार किए जाते है। ऐसे सिक्कों में 40 फीसदी तक की मिलवाट वाली गिलट और जर्मन सिल्वर के असल चांदी के बराबर 55 हजार से 57 हजार रुपए के भाव लिए जाते हैं। इससे मोटा मुनाफा होता है।

दूसरी : 99.99 फिसदी सिक्के गिलट या जर्मन सिल्वर से तैयार किए जाते हैं, लेकिन चमकदार दिखाने के लिए इन पर चांदी की पॉलिश कर दी जाती है। 800-900 रुपए किलों की मैन्युफैक्चरिंग लागत के बाद तैयार नकली सिक्कों को बाजार में असली चांदी के सिक्कों के बीच मिक्स कर आसानी से 55 हजार से 57 हजार रुपए के भाव से बेचा जाता है।

जर्मन सिल्वर क्या है?
जर्मन सिल्वर या निकल सिल्वर, तांबे का एक मिक्सचर मेटल है जिसमें निकल और जस्ता मिला होता है। इसमें 60 फीसदी तांबा, 20 फीसदी निकल और 20 फीसदी जस्ता होता है। इसे ’जर्मन सिल्वर’, नई चांदी, निकल, पीतल और इलेक्ट्रम नामों से भी जाना जाता है। दिखने में ’जर्मन सिल्वर’ चांदी जैसा होता है, लेकिन इसमें चांदी नाम मात्र की भी नहीं होती है। इसके नाम में ’जर्मन’ इसलिए आया क्योंकि इसका विकास जर्मनी के धातु कर्मियों ने किया था।
              ज्वेलरी का बिजनेस हमेशा से ही विश्वास पर होता आया है, लेकिन शहर में कई ज्वेलर सोने-चांदी की खरीद में घालमेल कर रहे हैं। इस ठगी को जांचने और रोकने का कोई तरीका नहीं है। हालत ये है कि 65, 70 व 80 फीसदी शुद्धता की चांदी आती है और दुकानदार कीमत 100 फीसदी की लेते हैं। उसके ऊपर से मेकिंग चार्ज अलग से लिया जा रहा है।

आईये बताते हैं सिक्कों की शुद्धता को जाचने के कुछ तरीके-
सिक्के की खनक से पहचानें : चांदी के सिक्के की क्वालिटी और प्योरिटी उसकी ‘खनक’ सुनकर भी चेक की जा सकती है। सिक्के को लोहे के टुकड़े पर टकराने से यदि खनक की आवाज ज्यादा आए, तो माना जाता है कि इसमें मिलावट है।

मैग्नेट टेस्ट : घर में सामान्य तौर पर चुंबक मिल जाती हैं। चांदी में मिलावट होगी, तो वह चुंबक से आकर्षित होगी। भले ही बहुत ही कम चिपके, लेकिन असली चांदी चुंबक से बिल्कुल भी आकर्षित नहीं होती।

आइस टेस्ट : बर्फ के टुकड़े से भी चांदी की परख हो सकती है। चांदी को बर्फ पर रखा जाए, तो वह तेजी से पिघलेगी। चांदी में थर्मल कंडक्टिविटी होती है, जो बर्फ को पिघलाने की रफ्तार को बढ़ा देती है।

पत्थर पर घिसकर या रगड़कर : चांदी के सिक्के को पत्थर पर रगड़ने यानी घिसने से जो लकीर बनती है, वो सफेद रंग की हो तो वो चांदी सही मानी जा सकती है। यही लकीर पीलेपन या ताम्बे के रंग जैसी दिखाई दे तो ये मिलावटी हो सकता है।

एसिड टेस्ट : सिल्वर कॉइन पर ज्वेलरी शॉप में हर समय उपलब्ध रहने वाले नाइट्रिक एसिड की एक बूंद डालने पर यदि उस जगह पर हरा या नीला रंग दिखे तो उसमें मिलावट तय है। यदि रंग सफेद या हल्का काला नजर आए तो वो सिक्का ओरिजिनल है।

अब सबसे बड़ा सवाल : क्या चांदी में गोल्ड की तरह हॉलमार्क नहीं होता?
एक्सपर्ट बताते हैं कि गोल्ड की तरह चांदी पर भी हॉलमार्किंग होती है, लेकिन इस धातु की वैल्यू कम होने के कारण सिक्कों पर हॉलमार्क जैसा ज्यादा प्रचलन नहीं है, क्योंकि उसकी फीस लगती है। एक-एक सिक्के पर फीस चुकाने से सिक्के की लागत बढ़ती है। यही वजह है कि कस्टमर भी सिक्कों में हॉलमार्क वाली चांदी की डिमांड नहीं करते।
              सर्राफा बाजार से जुड़े सूत्रों के अनुसार सरकारी मशीनरी के पास चांदी में मिलावट को पकड़ने का कोई मैकेनिज्म नहीं है। सरकार का नाप-तौल विभाग केवल तौल सही है या नहीं, इसकी जांच तक ही सीमित है। चांदी के सैंपल कलेक्शन भी नहीं होता है।

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