दिल्ली में करोड़ों के फ्लैट हुए पानी-पानी

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October 10, 2026

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दिल्ली में करोड़ों के फ्लैट हुए पानी-पानी

-खेल गांव के फ्लैटों से पंपों से निकाला जा रहा 24 घंटे पानी, लोग परेशान

नई दिल्ली/- 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स में खिलाड़ियों के ठहरने के लिए बनाये गये करोड़ों के फ्लैट आज प्रशासन की लापरवाही की वजह से पानी-पानी हो रहे हैं। यमुना फ्लडप्लेन इलाके में बने होने के कारण इस खेलगांव के लोगों को आजकल परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। यमुना का पानी बढ़ने और डूब इलाका होने के कारण यहां जमीन में पानी का रिसाव हो रहा है। इसबार रिकार्ड बारिश होने के चलते दिल्ली के ये आलिशान फ्लैट आज पूरी तरह से बदहाल हो चुके है। फ्लैटों के बेसमेंट में भरे बारिश के पानी की वजह से यहां की इमारतों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है और इमारतों को बचाने के लिए 30 से ज्यादा हेवी ड्यूटी पंप पिछले एक महीने से 24 घंटे पानी निकालने का काम कर रहे हैं।
                1100 अपार्टमेंट वाले इस कॉम्प्लेक्स में रहने वाले लोगों के अनुसार, पानी रिसने से बचाव के उपाय पिछले कुछ सालों से खराब हैं। यहां रहने वाले अमिताभ माथुर ने बताया, ’पानी को लगातार पंप करके निकाला जा रहा है। एक कर्मचारी को जेनरेटर रूम से लगातार पानी निकालना पड़ता है ताकि पानी का लेवल बिजली के तारों तक न पहुंच जाए। यही नहीं, हर दिन यहां लिफ्ट के लिए शाफ्ट से पानी निकालना पड़ रहा है। अब पानी रिसाव से अपार्टमेंट भी प्रभावित होने लगे हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि पानी ऊपर से नहीं, बल्कि उस जमीन से लीक हो रहा है जिस पर कॉम्प्लेक्स बना है।“
                  बता दें कि अपार्टमेंट्स का मालिकाना हक मुख्य रूप से डीडीए, केंद्रीय लोक निर्माण विभाग, विदेश मंत्रालय और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के पास है, लेकिन इस स्थिति को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा है। अमिताभ माथुर पूछते हैं, ’यमुना के फ्लड प्लेन में निर्माण के लिए करोड़ों रुपये क्यों खर्च किए गए, यह जानते हुए कि वहां पानी से समस्याएं खड़ी हो सकती हैं? तो इन्हे फिर सरकार ने लोगों को बेचा क्यों। उन्होने कहा कि इन्हे करोड़ों में बेचकर सरकार ने अपना पैसा वसूल कर लिया लेकिन अब जिन लोगों ने करोड़ों खर्च कर ये फ्लैट खरीदें है उनका क्या। क्या अधिकारियों ने इस बात पर कोई स्टडी की थी कि फ्लड प्लेन में अगर वॉटर बॉडी डिवेलप हो जाए तो क्या होगा?’ यहां मेंटेनेंस के काम में लगे कर्मचारियों ने कहा कि पंपों के लगातार चलने के कारण इस महीने बिजली का बिल बढ़ जाएगा। हालांकि पंप चलाना मजबूरी है क्योंकि ऐसा नहीं करने से बहुत ज्यादा पानी जमा हो जाता है। एक कर्मचारी ने कहा, ’यहां जलस्तर हर दिन 8 इंच की खतरनाक दर से बढ़ रहा है।’

बता दें कि गेम्स विलेज में अब तक रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) नहीं है। यहां के नोडल अधिकारी, रिटायर्ड जज अमरनाथ कहते हैं, ’समस्या को हल करने के लिए पेशेवर विशेषज्ञों की जरूरत है। इसके अलावा मरम्मत और रेनोवेशन के कामों का खर्च भी बहुत ज्यादा आएगा। मुझे जो पावर मिली हुई है, यह उससे बाहर है।’ उन्होंने कहा, ’वर्तमान में, हम स्टॉप-गैप उपायों के रूप में जो कुछ भी कर सकते हैं, कर रहे हैं। हालांकि इस समस्या के समाधान पर लगभग 15 करोड़ रुपये खर्च होंगे और इसे मंजूरी देना नोडल अधिकारी के दायरे से बाहर है। चीजों को कानूनी रूप से करने के लिए, हमें आरडब्ल्यू की आवश्यकता है, जो एक गवर्निंग बॉडी का चुनाव करेगा। गवर्निंग बॉडी ही बड़े पैमाने पर मरम्मत कार्य को मंजूरी दे सकता है। नोडल अधिकारी ने कहा कि इससे संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रहे दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस तरह के रेनोवेशन वर्क की देखरेख के लिए एक एडमिनिस्ट्रेटिव बॉडी बनाने का आदेश दिया है।

आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर एके गोसाईं के अनुसार, राष्ट्रमंडल खेल गांव यमुना के रास्ते में बनाया गया है, इसलिए यह स्थिति तो पैदा होनी ही थी। गोसाईं उस पर्यावरण समिति का हिस्सा थे जिसका गठन केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने उस समय किया था जब गेम्स विलेज की योजना बनाई जा रही थी। उन्होंने और आर्किटेक्ट केटी रवींद्रन ने यमुना के फ्लड प्लेन में एथलीटों के लिए अपार्टमेंट बनाने के प्रस्ताव का विरोध किया था।
                आखिर गेम्स विलेज में पानी का यह संकट आया क्यों है? गोसाईं कहते हैं, ’पानी को रोकने के लिए, निर्माण के समय यहां समुचित स्ट्रक्चर का निर्माण किया गया था। बावजूद इसके यह स्थिति आई है, क्योंकि आप कितनी भी गहरी खुदाई कर लें, आप रिवररॉक तक नहीं पहुंच सकते। ऐसे में जब तक नदी का लेवल बेसमेंट के लेवल से अधिक है, तब तक गेम्स विलेज के निचले हिस्सों का जलमग्न रहना तय है।’

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