गहलोत-पायलट की लड़ाई में हाशिये पर जाती कांग्रेस, कहीं पंजाब वाला हश्र ना हो जाए

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गहलोत-पायलट की लड़ाई में हाशिये पर जाती कांग्रेस, कहीं पंजाब वाला हश्र ना हो जाए

-गहलोत गुट किसी भी कीमत पर नही चाहता पायलट की ताजपोशी, खड़गे और माकन से नही बनी बात

जयपुर/- राजस्थान में कांग्रेसी सियासत बड़ी तेजी से पंजाब की राह पर चल रही है। कहीं गहलोत-पायलट की सत्ता की लड़ाई में कहीं कांग्रेस का हश्र पंजाब वाला न हो जाये। हालांकि कांग्रेस आलाकमान इस मसले को सुलझाने की हर संभव कोशिश कर रहा है लेकिन स्थिति साफ होने की बजाये और विकट होती जा रही है। ऐसा ही तत्कालीन कांग्रेसी सीएम कैप्टन अमरिन्दर सिंह को हटाने के घटनाक्रम में हो चुका है। उस वक्त भी एक दूसरे को पटखनी देने में जुटे सीएम कैप्टन और पार्टी प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्दू के जीत-हार की लड़ाई में अंततः सबसे ज्यादा नुकसान में कांग्रेस पार्टी ही रही थी। सत्ता गंवाई, पार्टी के बड़े नेता दूसरी पार्टियों में चले गए। जानकारों का मानना है कि गहलोत और पायलट गुट की लड़ाई में रविवार रात जयपुर में जो कुछ हुआ, वह संकेत है कि पंजाब की तर्ज पर कांग्रेस, राजस्थान में भी हाशिये की तरफ बढ़ रही है।
               रविवार को कांग्रेस आलाकमान के पर्यवेक्षक खड़गे और अजय माकन यहां पहुंच चुके थे। सबको इंतजार था, शाम विधायक दल की बैठक का। इसी बीच परिस्थितियां 360 डिग्री घूम गईं। प्रस्तावित बैठक धरी की धरी रह गई और 92 विधायक विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी के यहां पहुंच गए और गहलोत के समर्थन में सामूहिक इस्तीफा दे दिया। यही नहीं दो टूक कह दिया कि 2020 में पार्टी में बगावत करने वाले विधायकों में से एक भी उन्हें सीएम के रूप में स्वीकार नहीं। एक पद एक नेता को लेकर राहुल गांधी के बयान के बाद बदली परिस्थितियां क्षण भर में एकदम से बदल गईं। कहां पायलट खेमा अपने नेता सचिन पायलट के सीएम पद पर ताजपोशी की घोषणा का इंतजार कर रहा था, कहां सीएम की कुर्सी एकदम से इतनी दूर छिटक गई कि अब हाथ आती भी प्रतीत नहीं हो रही है।
             इस बार बगावती तेवर गहलोत का है कि किसी भी कीमत पर सीएम की कुर्सी पर पायलट स्वीकार नहीं। उनकी इस मंशा को उनके समर्थक अमली जामा पहनाने में जुड़ गए। इस घटनाक्रम से हतप्रभ दोनों पर्यवेक्षक सोमवार को उल्टे पैर दिल्ली की ओर लौट पड़े। राजनीति के जानकारों का मानना है कि विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और इस तरह के सियासी ड्रामे का खामियाजा कांग्रेस को 2023 के चुनाव में भुगतना ही होगा। भीतरी लड़ाई में व्यस्त रहने पर चुनाव में वे भाजपा जैसी विपक्षी पार्टी का मुकाबला कैसे कर पाएंगे।

2023 के रुझान आने शुरू हो गए
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने इस हालात पर तंज कसते हुए ट्वीट करके टिप्पणी भी कर दी है कि 2023 में जय भाजपा, तय भाजपा। एक दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा है कि इतनी अनिश्चितता तो किसी क्रिकेट मैच में भी नहीं, जितनी राजस्थान की कांग्रेस पार्टी और नेता को लेकर है। विधायकों की बैठकें अलग-अलग चल रहीं हैं। इस्तीफों का सियासी पाखंड अलग चल रहा है। ये क्या राज चलाएंगे, कहां ले जाएंगे, राजस्थान को अब तो भगवान बचाए राजस्थान को।

नुकसान पार्टी के खाते में
इस बात पर कोई शक नहीं है कि कांग्रेस में चल रहा घमासान लंबा खिंचेगा। यह लड़ाई जितनी लंबी खिचेगी, कांग्रेस को 2023 के चुनावों की तैयारी का वक्त उतना ही कम मिलेगा। जिस तरह से गहलोत के समर्थन में इस्तीफों का दांव खेला गया है, उसको लेकर पायलट शांत रहने वाले हैं, यह भी लोग नहीं मानते। यह बात अलग है कि संख्या बल कम होने की वजह से वह मुखर होने की स्थिति में नहीं हैं। मगर वह गहलोत को सबक सिखाने का  कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। यानि नुकसान पहुंचाने के लिए शह-मात का खेल जारी रहेगा। नतीजा, गहलोत जीते या पायलट हारें, सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस पार्टी को ही भुगतना होगा।

गहलोत का आत्मघाती दांव
गहलोत को कांग्रेस परिवार का सबसे करीबी माना जाता है। यही वजह है कि वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की रेस में न केवल सबसे आगे हैं, बल्कि उनका अध्यक्ष चुना जाना तय माना जा रहा था। इस घटनाक्रम के बाद हालात बदल सकते हैं। चूंकि पिछले तीन-चार दिनों के बीच के घटनाक्रम से यह संकेत साफ हो चुके थे कि आलाकमान ने राजस्थान के सीएम पर पर पायलट की ताजपोशी को सहमति दे दी है। रविवार को केंद्रीय पर्यवेक्षकों की रायशुमारी बस एक औपचारिकता है, लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। यानि यह सीधे आलाकमान के फैसले का खुला विरोध है। जानकार कहते हैं कि भले ही गहलोत अपनी जिद में किसी को सीएम बनवाने में सफल हो जाएं, लेकिन ताजा घटनाक्रम से उनकी कांग्रेस के वफादार की छवि पर सीधे असर डाल सकता है। उनका कमजोर होना भी राजस्थान में कांग्रेस की कमजोरी का सबब बनेगा।

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