नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/द्वारका/भावना शर्मा/मानसी शर्मा/- रुक्मिणी द्वादशी यानी भगवान कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी के जन्मदिन (इस दिन रुक्मिणी देवी पृथ्वी पर प्रकट हुई थीं) का महा उत्सव श्री श्री रुक्मिणी द्वारकाधीश मंदिर इस्कॉन द्वारका में शुक्रवार की शाम खूब धूमधाम से मनाया गया। इस दिन अनेक भक्तों ने इस युगल जोड़ी के श्री चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनसे अपने ऊपर कृपा बरसाने की प्रार्थना की। भीष्मक की पुत्री वैदर्भी (रुक्मिणी) वास्तव में शाश्वत लक्ष्मीदेवी की अवतार हैं जो भगवान की दुल्हन बनने योग्य हैं इसलिए भगवान कृष्ण ने उनसे विवाह किया।
रुक्मिणी और भगवान कृष्ण की प्रेम कहानी और उनका पलायन भगवान कृष्ण से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। भगवान कृष्ण और रुक्मिणी देवी ने दिव्य शाश्वत प्रेम का कारण एक-दूसरे का वर किया। भगवान ने उनकी इच्छा से शाल्व तथा शिशुपाल जैसे अनेक राजाओं को परास्त किया और सबके देखते-देखते रुक्मिणी को ऐसे उठा कर ले गए, जिस तरह निर्भीक गरुड़ देवताओं से अमृत चुराकर ले आए थे।
रुक्मिणी देवी को श्रीमती राधारानी का स्वांश भी माना जाता है। स्कंद पुराण में कहा गया है कि जो स्थान राधारानी का वृंदावन में है वही स्थान रुक्मिणी देवी का द्वारका में है। अतः इस महत्वपूर्ण दिन को यानी रुक्मिणी द्वादशी को वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष के बारहवें दिन मनाया जाता है। माना जाता है कि भगवान को फूल और उनकी सुगंध बहुत प्रिय है। जो लोग फूलों से अर्चना व स्तुति करते हैं, उनकी मनोकामनाएँ जरूर पूर्ण होती हैं।
इसी के साथ-साथ अनेक दिव्य गुणों से भरपूर आकर्षक मुख मधुर मुस्कान वाली, काली आँखों वाली, शांतचित्त, बुद्धिवान, श्रेष्ठ, कुलीन, कृष्ण को समर्पित दिव्य रुक्मिणी देवी इस दिन आप पर अपार कृपा बरसाती हैं बल्कि यूँ कहो कि लक्ष्मी की तरह उदार प्रिया यह देवी आपके घर चली आती हैं। उनका स्तुतिगान यूँ तो प्रातः 8 बजे से ही श्री रुक्मिणी भागवत कथा के रूप में आरंभ हुआ। कथा का वाचन श्रीमान प्रशांत मुकुंद प्रभु द्वारा किया गया। शाम 4 बजे कीर्तन में भारी संख्या में लोगों ने भाग लिया। सभी भक्तों की मौजूदगी में शाम 6 बजे 108 दिव्य द्रव्यों से महा-अभिषेक किया गया। शाम 7 बजे गोपाल फन स्कूल के बच्चों ने भगवान कृष्ण और रुक्मिणी माता की इस सुंदर प्रेम लीला को नृत्य-नाटिका के माध्यम से मंचित किया और इसके रुक्मिणी देवी जी की स्तुति पर भी नृत्य कर भक्तों का मन मोह लिया। तत्पश्चात भगवान को भोग अर्पित किया गया, रात 8 बजे सभी भक्तगणों महाआऱती ने भाग लिया और प्रसादम ग्रहण कर भगवान की असीम कृपा प्राप्त की।
महोत्सव की इसी कड़ी में 15 मई को नरसिंह चतुर्दशी मनाई जाएगी। इस दिन भगवान कृष्ण ने भक्त प्रह््रलाद की रक्षा हेतु हिरण्यकशिपु के संहार के लिए नरसिंह रूप धारण किया था। वे राजमहल के खंभे से आधे मनुष्य तथा आधे सिंह के रूप में प्रकट हुए। हिरण्यकशिपु को ब्रह्मा द्वारा वरदान प्राप्त था कि न तो वह मनुष्य और न ही किसी जानवर के द्वारा मारा जाएगा। न मनुष्य और ईश्वर निर्मित शस्त्रों से, न भूमि, जल, आकाश पर और न दिन और न रात में मारा जाएगा। इस तरह वह अमर होना चाहता था लेकिन भगवान ने ब्रह्मा के वरदान को भी अक्षुण्ण रखा और संध्या के समय अपनी गोद में अपने नाखूनों से उसे मार डाला। इस तरह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग से कोई नहीं बच सकता। विष्णु भगवान का भक्त प्रह््रलाद मात्र पाँच साल का बालक था जिसे उसके नास्तिक पिता द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा था। पर भगवान अपने भक्त का कष्ट नहीं देख सकते। अतः सभी प्रकार के कष्टों के हरण के लिए यह दिन बहुत उत्तम माना जाता है। इसीलिए प्रातः साढ़े 10 बजे से 12 बजे तक यज्ञ का आय़ोजन किया गया है ताकि सारे कष्टों की आहुति दी जा सके। प्रातः 8 बजे नरसिंह देव भगवान के रूप विस्तार के बारे में कथा होगी। शाम 4 बजे कीर्तन और 6 बजे महा-अभिषेक किया जाएगा। शाम साढ़े 7 बजे ‘यंग माइंड किड्स’ ग्रुप के बच्चे व काउंसिलिंग टीम द्वारा नाटक प्रस्तुत किया जाएगा, जिसमें अपने अभिनय द्वारा वे भक्त प्रह््रलाद की भक्ति और हिरण्यकशिपु के अहंकारी व्यक्तित्व को दर्शकों के सामने मंचित करेंगे। रात 8 बजे महाआरती व उसके बाद प्रसादम वितरण का कार्यक्रम रहेगा। अतः सभी भक्तों को इसमें भाग लेकर नरसिंह चतुर्दशी को अपने लिए फलदायी बनाना चाहिए।


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