अपनत्व की डोर से बांधते थे मुलायम

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अपनत्व की डोर से बांधते थे मुलायम

मुलायम सिंह यादव का बिछोह राजनीति के एक युग का अवसान है। वह बहुत नेकदिल सच्चे इंसान थे। मैं यह मानता हूं, वह संबंधों का मर्म समझते हुए रिश्तों को शिद्दत से निभाने वाली विरल शख्सियत थे। याद नहीं पहली..

संपादकीय/- लेखक कलराज मिश्र राजस्थान के गवर्नर हैंः-
मुलायम सिंह यादव का बिछोह राजनीति के एक युग का अवसान है। वह बहुत नेकदिल सच्चे इंसान थे। मैं यह मानता हूं, वह संबंधों का मर्म समझते हुए रिश्तों को शिद्दत से निभाने वाली विरल शख्सियत थे। याद नहीं पहली भेंट उनसे कब हुई थी, परंतु राजनीति के आरंभिक दिनों से ही उनसे एक निकट का नाता हो गया था। बाद के दिनों में यह नाता और गहरा होता गया। प्यार और सम्मान के गहरे अर्थों में समाहित होता चला गया। राजनीतिक दल को ध्यान में रखें, तो हम दोनों भले ही सदा अलग-अलग रहे, परंतु जो अपनापन और प्यार, सम्मान उन्होंने दिया, उसे मैं कभी भुला नहीं सकता।
मुझे याद है, आपातकाल के दौरान उन्होंने भी बहुत कष्ट झेले थे और जेल में रहे थे। भारतीय जनता पार्टी बनने के पश्चात उत्तर प्रदेश में भाजपा और लोकदल का राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा बना था, इसके अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव थे और महामंत्री मैं था। हमने बहुत से स्तरों पर साथ-साथ काम किया। राजनीति में रहते हुए इस बात को मैंने निकट से अनुभव किया कि उनमें न केवल उत्तर प्रदेश की गहरी भौगोलिक व सामाजिक समझ थी, बल्कि उनकी राजनीतिक दृष्टि भी बहुत व्यापक थी। अपने कार्यकर्ताओं के प्रति उनके मन में गहरा लगाव भी मैंने शुरू से ही देखा, महसूस किया। शायद इसी गुण के चलते वह अपनी पार्टी को सत्ता तक पहुंचा पाए।
             चुनावों के दौरान भी उनसे जब-तब संवाद होता रहता था और इस दौरान विमर्श से सदा नई राहें भी खुलती रहती थीं। राष्ट्रवाद से उनका गहरा लगाव भी मैंने निरंतर महसूस किया। अक्सर मैं मजाक में उनसे कह दिया करता कि आपको हमारी पार्टी में होना चाहिए था, तब वह हंसकर रह जाते थे। वह कुछ कहते नहीं थे, परंतु जानता हूं, बहुत से स्तरों पर उनकी दृष्टि राष्ट्र और समाज के सांस्कृतिक सरोकार से जुड़ी हुई थी।
राजनीति में जमीन से जुड़े उन जैसा नेता इस समय बहुत कम रह गए हैं। ऐसे में, मुलायम सिंह लोगों को और अधिक याद आएंगे। वह जन-जन से जुड़ाव रखने वाले सही मायने में जमीनी नेता थे। उन्हें सब ‘नेताजी’ ऐसे ही नहीं कहते थे, वह नेतृत्व के अद्भुत गुण रखने वाले नेता थे और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे। इसीलिए हर कोई उनके नेतृत्व में कार्य करने के लिए भी तत्पर रहता था। याद है, उत्तर प्रदेश में जब मायावती मुख्यमंत्री थीं, तब मैं उस समय सार्वजनिक निर्माण विभाग का मंत्री हुआ करता था। इटावा में तब हमने सार्वजनिक निर्माण विभाग से भवन बनवाए थे। उन्हीं दिनों समाजवादी पार्टी का एक अखिल भारतीय सम्मेलन वहां होने वाला था। उन्होंने फोन करके सम्मेलन में आने वाले लोगों के लिए वह भवन उपलब्ध कराने और दूसरी कुछ छोटी-मोटी व्यवस्थाएं करने के लिए आग्रह किया। उनकी छवि ऐसी थी कि उनका आग्रह न मानने का सवाल ही नहीं उठता था। मैं स्वयं वहां गया और त्वरित ढंग से अपने प्रमुख सचिव से कहकर सारी व्यवस्थाएं कराईं। मुझे याद है, बाद में मुलायम जब भी मिलते, तो इस प्रकरण का जिक्र जरूर छेड़ते थे। इस तरह की मदद कोई ऐसी बड़ी बात नहीं थी, लेकिन यह उनका व्यक्तित्व था कि वह भी किसी स्तर पर कोई सहयोग करता, तो उसको कभी भूलते नहीं थे।
               उत्तर प्रदेश में जब मैं सार्वजनिक निर्माण विभाग के मंत्री पद पर था, तब एक दफा सदन में बजट भाषण के दौरान समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने मेरे बारे में कुछ ऐसे अनर्गल शब्द बोल दिए थे, जो सत्य से बहुत परे थे। मैंने भी अपनी प्रतिष्ठा के लिए तब त्यागपत्र दे दिया था। मुझे स्मरण है, मुलायम सिंह यादव ने तब मुझे फोन किया था और कहा था कि मुझे इस बात पर सीधे त्यागपत्र नहीं देना चाहिए था। तब अपनी पार्टी के विधायक को भी उन्होंने कड़े शब्दों में फटकार लगाई थी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि कलराज जी के प्रति इस तरह की बातें करना राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ है।
               मुलायम सिंह दलगत राजनीति से बहुत ऊपर थे, संबंध निभाना जानते थे और जिससे भी निकटता होती थी, उसके लिए दलीय लीक से हटकर कुछ करना होता, तो वह उसमें चूकते नहीं थे। बहुत से ऐसे और भी प्रसंग हैं, जो आज याद आ रहे हैं और आगे भी याद आएंगे। कई ऐसे मामले भी हैं, जब मैंने राजनीतिक रूप से उन्हें कोई सलाह दी थी और उन्होंने ज्यादा सोचे बगैर ही मान लिया। ऐसे भी मौके आए, जब अपने स्वयं के दल के अंतर्गत भी कुछ बड़ा निर्णय करना होता था, तब भी वह विचार-विमर्श करते थे।
              मेरा जन्मदिन भी वह कभी नहीं भूलते थे! मैं कहीं भी होता, वह मुझे फोन पर तलाश करते और जब तक स्वयं बधाई नहीं दे लेते, चैन नहीं लेते थे। सोचता हूं, तो महसूस होता है, अब कहां हैं ऐसे रिश्ते निभाने वाले और संबंधों की मर्यादा समझने वाले व्यक्तित्व! मैं इस बात को भी स्वीकार करता हूं कि वह जब मुख्यमंत्री थे, तब मैंने जो भी काम बताया, उन्होंने तत्काल किया। प्रतिकूल समय में भी मेरी राय, मेरी बातों को उन्होंने माना, आज ऐसे व्यवहार की कोई किसी से आशा भी नहीं कर सकता।
               गांवों के विकास, गरीबों के उत्थान में उनकी गहरी रुचि थी। वह बहुत बडे़ नेता हो गए, लेकिन उन्होंने अपने गांव और निर्वाचन क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ा। गांवों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ वहां के पारंपरिक जीवन से भी उनका निकट का नाता बना रहा। व्यक्तिगत रूप से भी मुलायम सिंह के संबंध लोगों से इतने गहरे बनते थे कि लोग किसी दूसरे दल से भले जुड़ जाते थे, लेकिन मुलायम सिंह से उनका नाता नहीं टूटता था।
                उनके साथ की कितनी-कितनी यादें हैं, बातें रह-रहकर मन में इस समय कौंध रही हैं। मैं यह मानता हूं कि जो आत्मीयता और अपनत्व उनके साथ रहा, वह मेरे जीवन की अमूल्य थाती है। उनका बिछोह भारतीय राजनीति में कभी न भरने वाला खालीपन है। उनका अनंत में विलीन होना, सिद्धांत और रिश्तों की मर्यादा निभाते एक भरपूर प्यार-नेह निभाने वाले व्यक्तित्व का सदा के लिए हमसे दूर चले जाना है। मुलायम सिंह यादव का न होना, व्यक्तिगत मेरे लिए ऐसी रिक्तता है, जो कभी नहीं भरी जा सकेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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