नई दिल्ली/उमा सक्सेना/- केंद्र सरकार ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए अहम संशोधनों का प्रस्ताव रखा है। संसद में वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि मौजूदा प्रक्रिया में देरी का मुख्य कारण जरूरत से ज्यादा मुकदमेबाजी है। इस समस्या से निपटने के लिए अब सख्त प्रावधान लाने की तैयारी की जा रही है, ताकि कानून का गलत इस्तेमाल रोका जा सके और मामलों का जल्द समाधान हो सके।
अब 14 दिन में होगा इन्सॉल्वेंसी आवेदन पर निर्णय
प्रस्तावित बदलावों के अनुसार, यदि किसी कंपनी द्वारा कर्ज चुकाने में चूक (डिफॉल्ट) साबित हो जाती है, तो इन्सॉल्वेंसी के लिए दायर आवेदन को 14 दिनों के भीतर स्वीकार करना अनिवार्य होगा। इससे न केवल लंबित मामलों में तेजी आएगी, बल्कि पूरे सिस्टम में पारदर्शिता और भरोसा भी बढ़ेगा।
दुरुपयोग रोकने के लिए जुर्माने का प्रावधान
सरकार ने यह भी साफ किया है कि आईबीसी प्रक्रिया का गलत फायदा उठाने वालों पर अब आर्थिक दंड लगाया जाएगा। इससे अनावश्यक मुकदमों और कानूनी पेचिदगियों में कमी आएगी, जिससे न्याय प्रक्रिया अधिक सरल और तेज बन सकेगी।
श्रमिकों के हित रहेंगे सुरक्षित
सरकार ने भरोसा दिलाया है कि इस पूरी प्रक्रिया में कर्मचारियों और श्रमिकों के अधिकारों को प्राथमिकता दी जाएगी। उनके बकाया भुगतान को पहले सुनिश्चित करने का प्रावधान पहले से मौजूद है, जिसे और मजबूत किया जाएगा।
कुल 12 संशोधनों का प्रस्ताव
इस नए विधेयक में कुल 12 महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें समूह दिवालियापन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े मामलों के समाधान के लिए भी विशेष प्रावधान शामिल हैं, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मामलों में स्पष्टता आएगी।
बैंकिंग सेक्टर को मिलेगा मजबूती
सरकार का मानना है कि आईबीसी ने देश के बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसके जरिए बैंकों ने फंसे हुए कर्ज (NPA) का बड़ा हिस्सा वसूल किया है। नए संशोधनों के बाद यह प्रक्रिया और ज्यादा प्रभावी और तेज होने की उम्मीद है।
समयबद्ध समाधान ही मुख्य उद्देश्य
सरकार ने दोहराया कि आईबीसी का मकसद सिर्फ कर्ज वसूली नहीं, बल्कि कंपनियों को समय पर राहत और समाधान देना है। नए बदलाव इसी दिशा में एक बड़ा कदम माने जा रहे हैं, जिससे आर्थिक व्यवस्था को और मजबूती मिलेगी।


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