उपन्यास – (भाग 1)

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March 2, 2026

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बिलासपुर, छत्तीसगढ़/-    भोपाल  के  न्यू मार्केट  की भीड़भाड़ वाली गलियों में  24  वर्षीय दीपा, एक स्वतंत्र पत्रकार और 22 वर्षीय रोहन, एक उभरते हुए कवि, की मुलाकात  होती है। दोनों की बातचीत कुछ कविताओं और अधूरी कहानियों से शुरू होती है जो धीरे-धीरे गहरे भावनात्मक बंधन में बदल जाती है। दीपा अपने परिवारिक कलह, अतीत के दर्द और असफल प्रेम रिश्तों की छाया से जूझ रही है।   जबकि रोहन अपनी  ग़रीबी को हराने की कोशिश में अपनी कविताओं में खोया हुआ रहता है।
     दोनों अक्सर  एक-दूसरे में सांत्वना ढूंढते हैं लेकिन उनके बीच का प्रेम कभी पूर्णत: तक नहीं पहुँच पाता। दीपा  और रोहन  की मुलाकातें बढ़ती हैं।  दोनों भोपाल की लालघाटी ,मानव संग्रहालय, भारत भवन ,रविन्द्र भवन,हिंदी भवन से भारत लेकर बिड़ला मंदिर, श्यामला हिल्स के पुरानी हवेलियों  के साथ न्यू मार्केट कॉफी हाउस और बारिश की रातों में एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं।
      रोशन की कविताएँ दीपा के लिए एक आश्रय बन दिली सुकून देती हैं, जबकि सीमा की कहानियाँ रोहन  को अपने अंदर की सच्चाई से रूबरू करवाती हैं। फिर भी दोनों के बीच एक अनकही/ अदृश्य दीवार खड़ी है । दीपा का स्थाई डर है कि प्रेम हमेशा उसे छोड़कर चला जाता है  और रोहन की असमर्थता कि वह अपनी ग़रीबी और अपने अतीत की प्रेमिका, माया, को भूल नहीं पाता, जिसने एक अधेड़  वर्दी वाले दरोगा से शादी करके रोहन का दिल ही नहीं तोड़ा बल्कि चुनौती दे दी थी कि प्रेम से बड़ी चीज़ पद और प्रतिष्ठा है।
       दोनों का रिश्ता एक अधूरी किताब की तरह है। हर वाक्य, पैरा और पन्ना कुछ कहता है लेकिन अंत हमेशा अनिश्चित और अधूरा ही रहता है। दीपा चाहती है कि रोहन कविता के साथ ही की बड़ा अधिकारी / आदमी बने, क्योंकि साहित्य संतुष्टि तो देता है लेकिन पेट और पेट के नीचे की भूख पूरी नहीं करता।
      रोहन  की कविताओं में माया की छाया बार-बार उभरती है। एक रात, जब दीपा, रोहन  से अपने दिल की बात कहने की कोशिश करती है, रोहन  चुप रहता है। यह चुप्पी उनके बीच की दूरी को और गहरा देती है।
    साल भर बाद कहानी नया मोड़ लेती है जब दीपा  को सरकारी नौकरी मिल जाती है ।  विभागीय प्रशिक्षण के लिए उसे  नौ माह,  सागर जाना पड़ता है। सागर जाने से पहले  रोहन  समझाता है कि है, प्रशिक्षण के बाद वह दोनों शादी कर लेंगे।  दूसरी तरफ दीपा  अपनी भावनाओं  और अधूरेपन से थक चुकी है रोहन से दुःखी मन से कहती है कि प्रशिक्षण के बाद सोचेंगे ?  लेकिन इस बीच हम नहीं मिलेंगे और  अलविदा कहकर चली जाती है। रोहन का दिल ही नहीं टूटता दिमाग़ का दही भी बन जाता है।

रोहन  अपनी कविताओं में खोया  एक अंतिम कविता दीपा के नाम लिखता है लेकिन उसे कभी भेज नहीं पाता। नौ माह  बाद, दीपा भोपाल लौटती है, लेकिन अब वह पहले जैसी नहीं है। उसने अपने घरेलू  उलाहने से बचने के लिए  जिम्मेदारी को स्वीकार कर लिया है। पूरी शिद्दत के साथ अपनी नई नौकरी में खो जाती है। रोहन अब भी भोपाल की गलियों में भटकता है अपनी अधूरी कविताओं के साथ अधूरी कहानी का अंत एक खुले सवाल के साथ होता है, क्या प्रेम का अधूरापन ही उसकी सुंदरता है या यह एक अभिशाप है जो हमेशा पीछा करता रहता है? प्रेम का अधूरापन: प्रेम जो कभी पूर्ण नहीं हो पाता, फिर भी उसकी खोज और अनुभव जीवन को अर्थ देते हैं।अतीत का बोझ: कैसे अतीत की यादें और दर्द नए रिश्तों को प्रभावित करते हैं।
स्वयं की खोज  दीपा और रोहन दोनों अपने भीतर की सच्चाई और कमजोरियों का सामना करते हुए जीवन संघर्ष में आगे बढ़ते हैं।

  राजेन्द्र रंजन गायकवाड़
सेवानिवृत्त जेल अधीक्षक  

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