नई दिल्ली स्थित श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा 22 से 23 अगस्त को दिल्ली स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं तिरुपति स्थ राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में उत्कर्ष महोत्सव का आयोजन किया गया। यह उत्कर्ष महोत्सव मानित विश्वविद्यालय से केन्द्रीय विश्वविद्यालय के रूप में भारत सरकार द्वारा स्थापित किये जाने पर हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। आज महोत्सव के सम्पूर्ति अवसर पर सर्वप्रथम श्री ला ब शा रा सं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो मुरली मनोहर पाठक जी ने समागत अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह उत्कर्ष महोत्सव विकसित भारत के संकल्प में संस्कृत की भूमिका को रेखांकित करने में सफल रहा है। अपने समष्टि उद्बोधन में के सं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो श्रीनिवास बरखेड़ा ने कहा कि संस्कृत न केवल प्राचीन भारत की संस्कृति की भाषा है अपितु भविष्य की भी भाषा है।

राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान की कुलपति प्रो. शशिकला गुलाबराव बंजारी जी ने सारस्वत अतिथि के रूप में उद्बोधन करते हुए बताया कि संस्कृत अनेकों ज्ञान एवं विज्ञान का केन्द्र है और विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए संस्कृत का आश्रय लेना ही है। आज के समय में संस्कृत को जनसामान्य तक पहुंचाना है क्योंकि संस्कृत में निहित नैतिक विचारों एवं धर्मनिष्ठ कर्तव्यों से युवाओं को जोड़ना है। भारत की दृष्टि से शिक्षा आन्तरिक एवं बाह्य स्वरूप का बहुमुखी विकास करने वाली है।

लोकसभा सांसद सुश्री बांसुरी स्वराज जी विशिष्ट अतिथि के रूप में भाषण देते हुए कहा कि आज हम राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मना रहे हैं क्योंकि इसी दिन चन्द्रयान-3 अपने लक्ष्य पर पहुंचा था। संस्कृत केवल कम्प्यूटर के लिए ही सहयोगी नहीं सम्पूर्ण विज्ञान का अभिकेंद्र है। संस्कृत केवल कर्मकांड की भाषा नहीं बल्कि शोभता की भाषा है। विकसित भारत का संकल्प लेने वाले प्रधानमंत्री जी ने भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता को साथ लेकर चलने वाले भी हैं। आपका प्रत्येक कर्म आपके, समाज के, प्रदेश के एवं देश के विकास में सहायक होता है। हम पुनः कहते हैं कि विकसित भारत का स्वप्न संस्कृत से ही साकार होने वाला है।

इस अवसर पर पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. महेन्द्र नाथ पाण्डेय जी ने सभा को सनाथित किया। पाण्डेय जी ने अपने उद्बोधन में बताया कि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में संस्कृत में निहित ज्ञान विज्ञान को जोड़ना होगा। तभी विकसित भारत की अवधारणा सफल हो पाएगी, तभी भारत विश्व में अग्रणी हो पाएगा। हमें विश्व की उन्नति के लिए विकसित होना है। जिसमें संस्कृत की महनीय भूमिका अपेक्षित है क्योंकि यह संस्कृति व संस्कारों की भाषा है। सभी समस्याओं का समाधान संस्कृत में ही है। हमारे प्रधानमंत्री के विजन विकसित भारत 2047 को हम सब मिलकर साकार करेंगे और निश्चय ही हम संस्कृत के द्वारा अपने लक्ष्य को प्राप्त करेंगे।



अपने अध्यक्षीय भाषण में रा सं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो कृष्णमूर्ति जी ने इस महोत्सव की सफलता के लिए सभी को धन्यवाद देते हुए दिवंगत नेत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के थाईलैण्ड में दिये भाषण उद्धृत करते हुए कहा कि संस्कृत के विकास से ही विकसित भारत की कल्पना मूर्त्तरूप ले पायेगी। अन्त में श्री ला ब शा रा सं विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री सन्तोष कुमार श्रीवास्तव ने सभी का धन्यवाद किया। इस समापन कार्यक्रम का संयोजन प्रो. शिवशंकर मिश्र ने किया। इस कार्यक्रम में भारत के 17 संस्कृत विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने संस्कृत एवं रोजगार विशेष चर्चा करते हुए संस्कृत छात्रों के लिए रोजगार के अनेक मार्ग एवं स्थान बताये। विविध सत्रों में संस्कृत के मनीषियों ने विभिन्न विषयों पर विचार करते हुए संस्कृत को विकसित भारत के लिए अत्यन्त उपयोगी बताया तथा संस्कृत को भविष्य के साथ जोड़ने के लिए प्रेरित किया।


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