आरजेएस पीबीएच के 522वें सत्र में भाषा को बताया संज्ञानात्मक शक्ति और ‘सॉफ्ट पावर’ का आधार

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-अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर वैश्विक वेबिनार का आयोजन

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-   अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्या पर राम जानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस (आरजेएस पीबीएच) और आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 522वें वेबिनार में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने मातृभाषा के महत्व पर व्यापक चर्चा की। यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और भारत के विभिन्न राज्यों से जुड़े प्रतिभागियों ने एक स्वर में कहा कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि मानसिक विकास की बुनियाद और वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक प्रभाव का सशक्त साधन है।

कार्यक्रम का संचालन आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के संस्थापक एवं राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना के नेतृत्व में हुआ। वक्ताओं ने ‘मां की बोली’ के संरक्षण को सांस्कृतिक दायित्व बताते हुए इसे ‘सकारात्मक भारत 2047’ की दृष्टि से भी अनिवार्य बताया।

आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मातृभाषा की उपयोगिता
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के कार्यक्रम निदेशक सुनील कुमार सिंह ने भाषाई विविधता के आर्थिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्थानीय भाषा में संवाद करने वाले व्यवसाय उपभोक्ताओं के साथ अधिक भरोसेमंद संबंध स्थापित करते हैं। साथ ही उन्होंने प्रवासी भारतीयों के उदाहरण देते हुए बताया कि मातृभाषा से दूरी सांस्कृतिक विछिन्नता का कारण बनती है। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर बल दिया, ताकि बच्चों का आत्मविश्वास और बौद्धिक विकास सुदृढ़ हो सके।

संस्कृत और भारतीय भाषाओं का वैश्विक प्रभाव
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ब्रिटेन में ‘मेंबर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ (एमबीई) से सम्मानित और इंडियन वेजिटेरियन सोसाइटी के संस्थापक नितिन मेहता ने कहा कि भारतीय भाषाओं के प्रति विश्व में बढ़ता आकर्षण एक ऐतिहासिक परिवर्तन का संकेत है। उन्होंने संस्कृत की वैज्ञानिक संरचना और ध्वन्यात्मक सटीकता को इसकी वैश्विक स्वीकृति का आधार बताया। मेहता ने यह भी उल्लेख किया कि कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में संस्कृत अध्ययन को बढ़ावा मिल रहा है।

नागरी लिपि के विस्तार और भाषाई एकता पर चर्चा
नागरी लिपि परिषद के महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल ने नागरी लिपि के वैश्विक प्रसार की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि परिषद कई देशों में सक्रिय है और भारतीय भाषाओं को एक साझा लिपि मंच देने के प्रयास किए जा रहे हैं। उनका कहना था कि भाषाई अस्मिता किसी भी राष्ट्र की पहचान का प्रमुख स्तंभ होती है।

डिजिटल युग की चुनौतियां और त्रिभाषा सूत्र
नीदरलैंड की सांस्कृतिक विशेषज्ञ अश्विनी केलगांवकर ने डिजिटल दौर में भाषाओं के सामने आने वाली चुनौतियों पर विचार रखे। उन्होंने सुझाव दिया कि बच्चों को मातृभाषा के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय भाषा का संतुलित ज्ञान दिया जाए, ताकि वे भावनात्मक, सामाजिक और वैश्विक स्तर पर सक्षम बन सकें। सोशल मीडिया पर भाषा के प्रयोग में संयम और सकारात्मकता बनाए रखने पर भी जोर दिया गया।

शिक्षा और हीन भावना का प्रश्न
वेबिनार में शिक्षाविदों ने इस बात पर चिंता जताई कि अंग्रेजी माध्यम की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण कई बच्चे अपनी मातृभाषा से दूर हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने से सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनती है और बच्चों में आत्मसम्मान विकसित होता है।

आगामी कार्यक्रमों की घोषणा
सत्र के दौरान राष्ट्रीय विज्ञान दिवस, कबीर महोत्सव और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन की घोषणा भी की गई। आयोजकों ने कहा कि भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए ऐसे संवाद निरंतर जारी रहेंगे।

मातृभाषा ही राष्ट्र की आत्मा
वेबिनार का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि मातृभाषा केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाली शक्ति है। वक्ताओं ने कहा कि वैश्विक अवसरों के साथ-साथ अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखना आवश्यक है, ताकि भारत की विविध भाषाई धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।

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