नई दिल्ली/उमा सक्सेना/- भारतीय राजनीति में इन दिनों एक चर्चा लगातार ज़ोर पकड़ रही है कि प्रधानमंत्री पद की दौड़ में अमित शाह का मुकाबला योगी आदित्यनाथ या देवेंद्र फडणवीस से है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में जानकारों का मानना है कि हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। सच्चाई यह है कि अमित शाह का किसी नेता से प्रत्यक्ष मुकाबला है ही नहीं, क्योंकि वह पहले से ही सत्ता के शीर्ष केंद्र में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नहीं, लेकिन प्रधानमंत्री के समकक्ष प्रभाव
हालांकि अमित शाह औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री नहीं हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक ताकत और निर्णय लेने की क्षमता उन्हें प्रधानमंत्री के समकक्ष खड़ा करती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उन्हें केवल “नंबर दो” कहकर आंकना वास्तविकता को कम करके आंकने जैसा होगा। उनकी भूमिका सिर्फ गृह मंत्रालय तक सीमित नहीं है, बल्कि केंद्र और राज्यों की राजनीति में उनका सीधा हस्तक्षेप देखा जाता है।
टिकट वितरण से लेकर मंत्रिमंडल गठन तक अमित शाह का प्रभाव
लोकसभा चुनाव हों या विभिन्न राज्यों की विधानसभा, उम्मीदवारों के टिकट वितरण में अमित शाह की निर्णायक भूमिका मानी जाती है। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, मंत्रियों के चयन और राजनीतिक संतुलन बनाने में भी उनकी पकड़ बेहद मजबूत है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र सहित कई बड़े राज्यों की सरकारों में भी उनकी रणनीतिक भागीदारी साफ झलकती है।
पार्टी संगठन पर पूर्ण नियंत्रण
सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि पार्टी संगठन पर भी अमित शाह की गहरी पकड़ है। बूथ स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने में उन्होंने केंद्रीय भूमिका निभाई है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी लगातार चुनावी सफलता दर्ज कर पा रही है।
मोदी सरकार की रणनीतिक रीढ़ माने जाते हैं अमित शाह
राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली के पीछे अमित शाह की मजबूत रणनीति एक अहम कारण है। विदेश दौरों से लेकर बड़े राजनीतिक और सामाजिक अभियानों तक, प्रधानमंत्री को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर इसलिए मिलता है क्योंकि प्रशासनिक और राजनीतिक मोर्चे अमित शाह संभालते हैं।
उत्तराधिकारी की चर्चा और भविष्य की राजनीति
अमित शाह को प्रधानमंत्री मोदी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी भी माना जाता है। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक संकेतों के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी के रिटायरमेंट को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं हैं। 75 वर्ष की आयु सीमा पर बनी चर्चाओं के बावजूद, मोदी के लंबे राजनीतिक भविष्य को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं, जिससे यह साफ है कि अमित शाह का प्रधानमंत्री बनना समय की प्रतीक्षा भर हो सकता है।
राजनीति का असली शक्ति केंद्र
कुल मिलाकर, अमित शाह को केवल एक गृह मंत्री के तौर पर देखना अधूरा विश्लेषण होगा। वह सरकार और संगठन दोनों के ऐसे मजबूत स्तंभ बन चुके हैं, जिनके बिना मौजूदा सत्ता संरचना की कल्पना करना मुश्किल है। आने वाले वर्षों में उनकी भूमिका भारतीय राजनीति की दिशा तय करने में और भी निर्णायक साबित हो सकती है।


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