नई दिल्ली/सिमरन मोरया/- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दौरे के दौरान भारत और इजरायल ने डिफेंस टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को नेक्स्ट लेवल पर ले जाने का फैसला किया है। इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इजरायल, अपने लेटेस्ट हथियारों की टेक्नोलॉजी भारत को ट्रांसफर करने को तैयार हो गया है। इन हथियारों में एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल, लेजर वेपन और लंबी दूरी की स्टैंड-ऑफ मिसाइल और ड्रोन का संयुक्त विकास शामिल है। इन रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान पिछले साल नवंबर में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के इजरायल दौरे के दौरान साइन किए गए रक्षा सहयोग को बढ़ाने पर मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग को आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया है।
लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर इतना भी आसान नहीं होता है। हालांकि ये बात सच है कि इजरायल, अपने एडवांस हथियार भारत में बनाना चाहता है। इसके पीछे वजह ये है कि इजरायल एक छोटा देश है और उसे डर रहता है कि दुश्मनों के मिसाइल उसके हथियार केन्द्रों को निशाना बना सकते हैं। फिर भी इस बात की कितनी संभावना है कि इजरायल अमेरिका की साफ मंजूरी के बिना आयरन डोम और आयरन बीम समेत अपनी सभी लेटेस्ट डिफेंस टेक्नोलॉजी भारत को ट्रांसफर कर देगा? टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कैसे होता है और किसी तीसरे देश को क्रिटिकल टेक्नोलॉजी देने को लेकर कानूनी स्थिति क्या होती है?
इजरायल का आयरन बीम क्या है?
आयरन बीम एक 100kW हाई-एनर्जी लेजर (HEL) सिस्टम है जिसे रॉकेट, मोर्टार और ड्रोन को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है। ये एक बहुत एडवांस हथियार है जो फिलहाल किसी देश के पास नहीं है। ये ड्रोन स्वार्म हमले से निपटने में माहिर है। सबसे खास बात ये है कि इसकी कीमत करीब 2 डॉलर प्रति शॉट है। इसकी मुख्य टेक्नोलॉजी को इजरायली कंपनी रफायल और इजरायली रक्षा मंत्रालय (IMOD) ने 30 सालों की कड़ी मेहनत के बाद डेवलप किया है। भारत के लिए दिक्कत ये है कि अमेरिका इसके इंडस्ट्रियलाइज़ेशन में एक बड़ा पार्टनर बन गया है। 2024 और 2025 में अमेरिकी संसद ने खास तौर पर सिस्टम की खरीद, इंटीग्रेशन और लगातार डेवलपमेंट के लिए 1.2 अरब डॉलर से ज्यादा इजरायल को दिए हैं।
रफायल और लॉकहीड मार्टिन के बीच 2022 में इसको लेकर एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत अमेरिका में इस्तेमाल होने लायक इसके वैरिएंट को बनाने के लिए एक फ्रेमवर्क बनाया था। 2026 की शुरुआत तक इस टेक्नोलॉजी को अमेरिकी सेना के डायरेक्टेड एनर्जी प्रोग्राम के साथ शेयर किया जा रहा है। खुद इजरायली सेना को ये दिसंबर 2025 में सौंपा गया है।
आयरन बीम एयर डिफेंस सिस्टम और अमेरिका
आयरन बीम एयर डिफेंस सिस्टम काफी ज्यादा आकर्षक है। आज के युद्ध में अगर कोई दुश्मन 500 डॉलर के ड्रोन लॉन्च करता है तो उसने मारने के लिए 50 हजार डॉलर से ज्यादा के मिसाइल इंटरसेप्टर की जरूरत होती है। लेकिन सिर्फ 2 डॉलर प्रति शॉट के हिसाब से ड्रोन को खत्म कर सकता है। यानि काफी कम कीमत में दुश्मन के ड्रोन तबाह किए जा सकते हैं। इसीलिए भारत इसे हासिल करना चाहता है।
इजरायल ने अपने ज्यादातर हथियारों को लेकर अमेरिका से कोलेबोरेशन कर रखा है। उदाहरण के लिए, आयरन डोम को बनाने के लिए अमेरिका ने करोड़ों डॉलर का फंड किया था। करीब 50% तामीर इंटरसेप्टर US में रेथियॉन बनाता है। आयरन बीम को हालांकि इजरायल ने शुरू से ही खुद ही फंड किया था लेकिन अब ये प्रोग्राम में अमेरिका भारी भरकम फंड लगा चुका है। फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि वॉशिंगटन, इजरायली आयरन बीम के बेचने को कंट्रोल करेगा, लेकिन इजरायल को अमेरिका से मंजूरी लेने की जरूरत होगी।
क्या अमेरिका की मंजूरी के बिना इजरायल भारत को दे सकता है टेक्नोलॉजी?
द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर अमेरिका के फेडरल कानून के तहत बहुत सख्त कानून के अंदर आता है। भले ही ये प्रोडक्ट इजरायल में क्यों ना बना हो, फिर भी ये उसी कानून के तहत आएगा। इसलिए इजरायल के लिए आयरन बीम टेक्नोलॉजी को भारत को ट्रांसफर करना काफी मुश्किल काम है। अगर इजरायल भारत को पूरा ट्रांसफर ऑफर करता है तो इजरायल ऐसा तभी कर सकता है जब अमेरिका से उसे कानूनी तौर पर इजाजत मिले। इसीलिए आयरन बीम जैसे हाई-एंड लेजर टेक्नोलॉजी के लिए ये काफी मुश्किल है।
रिपोर्ट के मुताबिक द्विपक्षीय समझौते के तहत इजरायल को भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए अमेरिकी विदेश विभाग से लिखित में इजाजत लेनी होगी। इस समझौते के तहत ऐसी टेक्नोलॉजी को किसी तीसरे देश को ट्रांसफर करने या संयुक्त विकास पर रोक है। जिसका मतलब ये हुआ हुआ कि इजरायल को भारत से समझौता करने के लिए अमेरिका से मंजूरी की जरूरत होगी। द वायर ने दावा किया है कि इजरायल को भारत के साथ किसी भी डील के लिए अमेरिका को एक फॉर्मल थर्ड पार्टी ट्रांसफर रिक्वेस्ट देनी होगी। इसके साथ एंड यूजर मॉनिटरिंग भी आती है। अमेरिका के पास यह देखने का अधिकार है कि भारत में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है और क्या ये अमेरिका के दुश्मनों में लीक तो नहीं होगा। इसीलिए इस टेक्नोलॉजी का भारत को ट्रांसफर काफी मुश्किल लग रहा है।


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