नई दिल्ली/अनीशा चौहान/- श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं आइसीपीआर के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन में कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक जी ने बताया कि ‘हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा में योग एवं आयुर्वेद के ग्रंथ चिकित्सा शास्त्र के रूप में प्रसिद्ध हैं। एक तरफ आयुर्वेद शारीरिक चिकित्सा प्रधान है, तो योग मानसिक चिकित्सा प्रधान है। वस्तुतः इन दोनों शास्त्रों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि इनमें सभी प्रकार के रोगों के उपचार की चिकित्सा बतायी गयी है। बिगड़ते आधुनिक दिनचर्या के कारण प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के रोग से अवश्य पीड़ित है। योग एक ऐसी विद्या है, जिसमें सर्वविध रोगों के उपचार के उपाय निहित हैं। योग के आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि साधनों से विविध मानसिक रोगों से बचा जा सकता है।’ मुख्य अतिथि के रूप में तिरुपति स्थित श्री वेंकटेश्वर वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राणि सदाशिव मूर्ति जी ने आशीर्वचन देते हुए कहा कि योग एवं मानसिक स्वास्थ्य पर आयोजित यह सेमिनार आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है। इस प्रकार के सेमिनार के आयोजन से छात्रों एवं जनसामान्य को मानसिक स्वास्थ्य में योग की भूमिका प्रकाश में लाया जा सकता है।

प्रथम ज्ञान सत्र के मुख्य वक्ता के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. रामनाथ झा जी ने मानसिक स्वास्थ्य की विभिन्न अवस्थाओं का विवेचन करते हुए कहा कि योग में वह शक्ति विद्यमान है, जो विभिन्न मानसिक रोगों से पीड़ित शरीर को स्वस्थ कर सकती है, केवल उसको जागृत करने की आवश्यकता है। योग के ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ तथा ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्’ सूत्र का उल्लेख करते हुए मानसिक स्वास्थ्य की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि का विवेचन किया। विशिष्ट वक्ता के रूप में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण संकाय प्रमुख प्रो. शिवशंकर मिश्र जी ने बताया कि विविध मानसिक रोगों में से अनिद्रा एक प्रकार का ऐसा मानसिक रोग है, जो व्यक्ति के सम्पूर्ण दिनचर्या एवं स्वास्थ्य को नष्ट-भ्रष्ट कर देता है। योग एक ऐसा साधन है, जो अनिद्रा के साथ-साथ सभी मानसिक रोगों का उपचार करता है।

द्वितीय ज्ञानसत्र की मुख्य वक्ता सर्वोदय पी जी कालेज, घोसी, मऊ, उत्तर प्रदेश की प्राचार्य प्रो. वन्दना पाण्डेय जी ने विविध शास्त्रों में निहित योग के संदर्भों को उद्धृत करते हुए उनके सामाजिक उपयोगिता का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि वेद से आधुनिक काव्य पर्यन्त तक योग विभिन्न रूपों में प्रतिपादित है, जिसको विविध समस्याओं में उपाय के रूप में ग्रहण किया जाता है। वक्ता डॉ. विजय सिंह गुसाईं ने मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से योग एवं उसकी उपयोगिता पर विशिष्ट व्याख्यान किया। डॉ. इन्दु शर्मा जी ने श्रीमद्भगवद्गीता एवं योग से व्यावहारिक समस्याओं के निवारण के उपाय बताये। डॉ. मेघा जैन जी ने मनोवैज्ञानिक रोगियों की मानसिक अवस्था एवं उनके स्वास्थ्य पर विशेष प्रकाश डाला। प्रो. वीर सागर जैन जी ने सभी वक्ताओं की सराहना की तथा संयोजक को बधाइयाँ दी। इस कार्यक्रम में 88 शोध पत्रों का वाचन किया गया, जिसमें डीयू, जेएनयू, एलबीएस, सीएसयू, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय तथा अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय, महाविद्यालय तथा संस्थान से शिक्षक, आचार्य एवं शोध छात्रों ने प्रतिभाग किया। सम्पूर्ण कार्यक्रम का आयोजन डॉ. विजय गुप्ता ने किया।


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