श्री हरि विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के बारे में जाने यह खास बातें

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August 24, 2026

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श्री हरि विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के बारे में जाने यह खास बातें

नजफगढ़ मेट्रो न्यूज़/ नई दिल्ली/ मानसी शर्मा –आज के दिन हर वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान विष्णु के छठवें अवतार भगवान परशुराम जयंती मनाई जाती है। इसी तिथि पर अक्षय तृतीया का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन भगवान परशुराम की पूजा विधि- विधान के साथ की जाती है और शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं।

कौन थे परशुराम ?

  1. परशुराम ऋषि जमादग्नि तथा रेणुका के पांचवें पुत्र थे. ऋषि जमादग्नि सप्तऋषि में से एक ऋषि थे.
  2. परशुराम वीरता के साक्षात उदाहरण थे.
  3. हिन्दू धर्म में परशुराम के बारे में यह मान्यता है, कि वे त्रेता युग एवं द्वापर युग से अमर हैं.

परशुराम जंयती का महत्तव

  1. परशुराम भगवान के नाम पर उनके मंदिरों में हवन , पूजन का आयोजन किया जाता है, इस दिन अक्षय तृतीया भी मनाई जाती हैं सभी लोग पूजन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और दान आदि करते हैं।  
  2. वराह पुराण के अनुसार , इस दिन उपवास रखने एंव परशुराम को पूजने से अगले जन्म में राजा बनने का योग प्राप्त होता हैं।
  3. इस दिन बड़े – बड़े जुलूस , शोभायात्रा निकाले जाते हैं , इस शोभायात्रा में भगवान परशुराम को मानने वाले सभी हिन्दू, ब्राह्मण वर्ग के लोग भारी से भारी संख्या में शामिल होते हैं

भगवान परशुराम अस्त्र

  1. परशुराम शिवजी के उपासक थे। उन्होनें सबसे कठिन युध्दकला ‘’कलारिपायट्टू की शिक्षा शिवजी से ही प्राप्त की. शिवजी की कृपा से उन्हें कई देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्राप्त हुए थे.
  2. परशुराम का मुख्य अस्त्र “कुल्हाड़ी” माना जाता है. इसे फारसा, परशु भी कहा जाता है. परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्मे तो थे, परंतु उनमे युद्ध आदि में अधिक रुचि थी. इसीलिए उनके पूर्वज च्यावणा, भृगु ने उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने की आज्ञा दी. अपने पूर्वजों कि आज्ञा से परशुराम ने शिवजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया. शिवजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. तब परशुराम ने हाथ जोड़कर शिवजी की वंदना करते हुए शिवजी से दिव्य अस्त्र तथा युद्ध में निपुण होने कि कला का वर मांगा. शिवजी ने परशुराम को युद्धकला में निपुणता के लिए उन्हें तीर्थ यात्रा की आज्ञा दी. तब परशुराम ने उड़ीसा के महेन्द्रगिरी के महेंद्र पर्वत पर शिवजी की कठिन एवं घोर तपस्या की ।

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