6 सितम्बर तीजा पर्व पर विशेष: “तीजा” महिलाओं का सबसे बड़ा व्रत

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January 19, 2026

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6 सितम्बर तीजा पर्व पर विशेष: “तीजा” महिलाओं का सबसे बड़ा व्रत

भारतीय परंपरा में महिलाओं के लिये तीज का व्रत सबसे अहम व्रत माना जाता है। भारतीय महिलायें चाहे वह विवाहित हो या कुंवारी कन्यायें यह व्रत सर्वगुण संपन्न पति की कामना और उसकी सुरक्षा कुशलता के लिये रखती हैं। इस व्रत के प्रति प्रायः सारे भारत वर्ष की महिलायें काफी सजग रहकर व्रत का नियम पूर्वक पालन करती हैं। तीज व्रत महिलायें पूरे तन मन धन से मनोयोग से रखती हैं। उनकी आस्था का इससे ज्यादा और क्या प्रमाण मिलेगा कि वे इस दिन जल तो क्या गले का थूक भी नहीं गटकती है कि कहीं व्रत भंग ना हो जाए।

 मान्यता चली आ रही है कि तीज व्रत रखने वाली महिला भादो माह के हस्त नक्षत्र युक्त शुक्ल तृतीया को मात्र इसका अनुष्ठान करने से ही सब पापों से मुक्त हो जाती है। तीजा पर्व के दिन सुहागिन महिलाएं या कुंवारी कन्यायें जो यह व्रत रखती हैं वे सारे दिन निर्जला उपवास रख कर रात्रि होते ही पूजा पाठ की तैयारियों में लग जाती हैं। संध्या के बाद वे पूरा श्रृंगार कर पूजा पाठ करती हैं। फिर रतजगा कर एक जगह इकट्टा होकर महिलाएं भजन कीर्तन करती हैं। कई घरों में “फुलहरा” रखा जाता है यह फुलहरा भी एक प्रकार के पूजा की विधि है जिसे एक बार उठा लेने से जीवन भर इसे निभाना होता है। फुलहरा रखने वाली महिला पूजा स्थल में जोत कलश रखती हैं, जिसे रातभर सजगता से जलाना होता है। इसे बुझना नहीं चाहिये, वरन अशुभ माना जाता है। पूरा व्रत निरर्थक हो जाता है।

 तीज व्रत का प्रारंभ धार्मिक व सर्वमान्यतानुसार पार्वती के द्वारा भगवान शंकर को ही जन्म जन्मांतर तक अपने पति रूप में पाने की कामना से किये गये व्रत से माना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि यह व्रत जो भी स्त्री पूरे नियम से रखकर पूर्ण करेगी, उसे भी मां पार्वती के समान ही सुख व मनोवांछित वर प्राप्त होता  है। माना जाता है कि पार्वती जी ने शंकर भगवान को पतिरुप में पाने के लिये घनघोर तपस्या की थी। पार्वती ने बाल्यावस्था से ही हिमालय पर्वत पर कई वर्षों तक उलटे टंगकर केवल धुंवा पीकर तप किया। चौंसठ वर्ष तक सूखे पत्ते खाये। माघ मास में जलासन रखा वैशाख की दुपहरिया में पंचाग्नि तापती रहीं। सावन में भूखी प्यासी रहकर कठोर तप किया। पार्वती का ऐसा दुःसह्य तपस्या देखकर उनके पिता महाराज बहुत चिंतित रहने लगे।

महाराज हिमराज इसी चिंता में घुलने लगे कि अपनी बेटी के लिए योग्य वर कहां से लाऊं। इसी बीच एक दिन नारद उनके पास पहुंचे और उनसे कहा कि महाराज में भगवान विष्णु का दूत बनकर आया हूं, आप की कन्या के लिये विष्णु समान योग्य कर अन्यत्र नहीं मिलेगा। इसलिये आप अपनी पुत्री का विवाह भगवान विष्णु से कर देवें। यह संदेश हिमराज ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। जब उन्होंने यह समाचार अपनी पुत्री पार्वती को सुनाया तो वह बहुत दुःखी हो गई। उनका दुख देखकर उनकी सखियां ने उन्हें सलाह दी कि वे कुछ दिन के लिये किसी ऐसे वन में चली जाये, जहां का उनके पिता को पता न लग सके। अतः सलाह मानकर वे हिमालय के घने वन के भीतर नदी किनारे एक अंधेरी कंदरा में जाकर अपनी तपस्या पुनः प्रारंभ की और फिर भादो शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान शंकर की नदी के बालू से प्रतिमा बनाकर पार्वती जी ने निराहार रहकर व्रत रखा और विधिवत पूजन आराधना की।

 पार्वती की पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर साक्षात प्रगट होने को मजबूत हो जाते हैं। और तब शंकरजी पार्वती से कहते हैं मैं तुम पर प्रसन्न हूँ वर मांगो! पार्वती ने कहा – “आप मेरे पति बनें। शंकर जी ने कहा “तथास्तु!’ अंततः उनकी शंकर के प्रति भक्ति भावना को देखकर पार्वती के पिता ने उनका विवाह शंकर जी से ही कराया।

       ‌जिस प्रकार पार्वती जी को मनचाहा वर मिला, उसी प्रकार तीजा का व्रत पूरे विधिविधान से संपन्न करने पर सर्व मनोकामना पूरी होती है। व्रत के “दिन महिलाये जो व्रत रखने वाली होती हैं वे सूर्योदय से पूर्व उठकर भगवान शंकर का स्मरण कर स्नानादि से निवृत्त होकर माता पार्वती की आराधना करती हैं। पूजन स्थल पर छोटा मंडप बनाकर मंडप को अनेक प्रकार के फूल पान से युक्ति कर सजाया जाता है। पार्वती की प्रतिमा बनाकर रखते हैं। सुहागिने पूर्ण श्रृंगार कर तैयार हो पूजा करती हैं। पूजा में सर्वप्रथम जल से भगवान को स्नान कराया जाता है। फिर चंद्न फूल चढ़ावे जाते हैं। मौसम के अनुकूल फल चढ़ाकर अछत, पंचामृत से भी पूजा करते है। फिर अपनी सामर्थानुसार नवीन व स्वर्ण, रजत, सहित  बिन्दी, रिवन, सिंदूर, आदि चढ़ाये जाते हैं व अनेक प्रकार के नैवेद्य बनाये जाते हैं। इसके पश्चात धूप दीप से यथोचित मंत्रों को उच्चारण कर पूजन किया जाता है, एवं रातभर रतजगा कर कीर्तन करते हैं। व्रत के बाद ब्राम्हण को दान दक्षिणा देने का भी विधान है। व्रत के दूसरे दिन प्रातः भगवान की प्रतिमाओं सहित सभी पूजन सामग्री को नदी तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। व्रत के समाप्ति से पूर्व सभी महिलाये  भगवान को स्मरण अपनी भूलचूक की माफी मांगकर सभी के लिए कल्याण और समृद्धि की कामना करती हैं।

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