नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/द्वारका/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/भावना शर्मा/- तीन कृषि बिलों की निरस्ती को लेकर पिछले 63 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों ने मंगलवार को गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में ट्रैक्टर परेड निकाली। जिसमें हुई हिंसा से न केवल देश शर्मसार हुआ बल्कि किसानों के नाम पर भी कलंक लग गया। हालांकि पुलिस और किसानों के बीच इस परेड को लेकर रूट निर्धारित हो गये थे और किसानों ने शांतिपूर्ण ट्रैक्टर परेड करने का आश्वासन दिया था। लेकिन अचानक किसान उग्र हो गये और रूट से हटकर दिल्ली में घुसने की कोशिश करने लगे। इतना ही नही कई जगह किसानों ने पुलिस के साथ हाथापाई भी की जिसमें काफी संख्या में पुलिसकर्मी घायल भी हुए लेकिन फिर भी पुलिस ने किसानों का मान रखते हुए पिटने के बाद भी उन पर कोई जवाबी कार्यवाही नही की। पुलिस की इसी सहनशीलता की आज पूरे देश में काफी तारीफ हो रही है। हर आमो खास पुलिस को बधाई दे रहा है और पुलिस के इसी रवैये के चलते कुछ किसानों ने इस आंदोलन से हटने का फैसला भी ले लिया है। हालांकि मंगलवार को पुलिस के साथ हुई किसानों की झड़प में पुलिस कार्यवाही कर सकती थी लेकिन पुलिस सिर्फ किसानों को रोकती रही और किसान उन पर लाठी, डंडों व तलवारों से हमला करते रहे। आखिर ये किसान थे या फिर एक सोची समझी योजना के तहत उपद्रवी जो किसानों के भेष में दिल्ली को आग के हवाले करना चाहते थे। आज पुलिस की सहनशीलता को पूरा विपक्ष भी सराह रहा है। पूरे देश में दिल्ली पुलिस के लिए सहानुभूति की लहर चल पड़ी है। लोग पुलिस को अच्छे काम के लिए बधाई दे रहे। लेकिन फिर भी एक सवाल जो यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है वो ये है कि क्या दिल्ली पुलिस के जवान इंसान नही है। वो भी किसानों के बेटे है इस देश के नागरिक है। जो देश सेवा के लिए ही काम कर रहे है। फिर किसानों ने पुलिस के खिलाफ ऐसा दरिंदगी भरा काम क्यों किया और किसके इशारे पर किया यही सबसे बड़ा सवाल है। हालांकि किसान आंदोलन में बार-बार अडानी व अंबानी को निशाना बनाया जा रहा था और लालकिले पर हमला कही अडानी को लेकर तो नही हुआ। पुलिस को इसकी जांच करनी चाहिए। देश का हर नागरिक अब इस आंदोलन की सच्चाई जानना चाहता है कि क्या ये वास्त्व में किसान है या फिर किसान के भेष में कोई और ही दिल्ली की सीमाओं पर बैठा है जिसे हम पहचानने में भूल कर रहे हैं। कहीं ऐसा न हो की हमे इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़े। क्योंकि जिस तरह से पहले सिर्फ कुछ किसान, फिर हजारों किसान और फिर अकाली जत्थेदार। यहां सवाल यह भी है कि क्या एक ही राज्य का किसान इन बिलों से सबसे ज्यादा प्रभावित है या फिर पूरे देश के किसान। अगर पूरे देश के किसान इसे अपने खिलाफ मानते तो आज पूरा देश बंद हो चुका होता क्योंकि देश में 75 प्रतिशत तो किसान ही है लेकिन नही किसान आज भी अपने खेतो में काम कर रहा है और किसानों के नाम पर उपद्रवी व छुटभैयये नेता आज दिल्ली की सीमाओं पर बैठें। मंगलवार के हिंसक आंदोलन के बाद उक्त किसानों के खिलाफ देश में आवाज उठन्ी शुरू हो चुकी है। वहीं कुछ संगठनों ने तो इस आंदोलन से पल्ला झाड़ने का भी ऐलान कर दिया है। फिर भी गणतंत्र दिवस पर देश को शर्मसार करने की घटन को कभी भुलाया नही जा सकेगा। इस उपद्रव मंे पुलिस के करीब 150 जवान व अधिकारी गंभीर रूप से घायल हुए। लालकिले पर जहां आज तक देश की आन-बान-शान का तिरंगा लहराता आया है वहां उसी तिरंगे का तथा कथित किसानों ने अपमान किया जिसके लिए देश को अपमान सहना पड़ा और किसानों पर इसका कलंक लगा। फिर भी दिल्ली पुलिस की सहनशीलता बधाई की पात्र बनी की इतना कुछ होने के बाद भी पुलिस ने किसानों के नाम पर कोई कार्यवाही नही की। पुलिस चाहती तो इस कृत्य पर पलटवार कर सकती थी और आतताईयों को सबक सीखा सकती थी। फिलहाल दिल्ली की सुरक्षा के लिए पुलिस ने सीमाओं पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। और अब पुलिस किसी भी गलत धटना का जवाब देने के लिए पूरी तरह से तैयार है।


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